कुरान - 7:101 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

101
تِلۡكَ ٱلۡقُرَىٰ نَقُصُّ عَلَيۡكَ مِنۡ أَنۢبَآئِهَاۚ وَلَقَدۡ جَآءَتۡهُمۡ رُسُلُهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِ فَمَا كَانُواْ لِيُؤۡمِنُواْ بِمَا كَذَّبُواْ مِن قَبۡلُۚ كَذَٰلِكَ يَطۡبَعُ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِ ٱلۡكَٰفِرِينَ

Transliteration: (Tilkal quraa naqussu 'alaika min ambaaa'ihaa; wa laqad jaaa'at hum Rusuluhum bilbaiyinaati famaa kaanoo liyu'minoo bimaa kazzaboo min qabl; kazaalika yatba'ul laahu 'alaa quloobil kaafireen)

ये वे बस्तियाँ हैं, जिनके समाचार हम आपको सुनाते हैं [236]। और यक़ीनन उनके पास उनके रसूल साफ़ निशानियों के साथ आए, लेकिन वे उस पर ईमान न ला सके जिसे उन्होंने पहले ही झुटला दिया था [237]। इस तरह अल्लाह ने इनकार करने वालों के दिलों पर मुहर लगा दी [238]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 101 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ'राफ़ – आयत 101 की तफ़्सीर

 

✅ [236] तबाह हो चुकी बस्तियों से मिलने वाली सीख

इससे यह बात स्पष्ट होती है कि उन घटनाओं को पढ़ना, जिनकी वजह से क़ौमें हलाक हुईं, सबक़ लेने और चेतावनी पाने का बेहतरीन ज़रिया है। इसी तरह पैग़म्बरों और अल्लाह के नेक बंदों की ज़िंदगियों को पढ़ना भी ज़रूरी है ताकि इबादत का जज़्बा पैदा हो। ये क़िस्से सिर्फ़ इतिहास नहीं हैं, बल्कि हर दौर के लिए नैतिक रहनुमा हैं।

✅ [237] पैग़म्बरों का इंकार करने का अंजाम

इससे ये मालूम होता है कि अल्लाह के रसूल का अपमान करना या उनसे दुश्मनी रखना, दिल पर मुहर लगने का सबब बनता है। अल्लाह हमें इससे महफूज़ रखे। यह मुहर उस ज़ंग की तरह होती है जो लोहे को खा जाती है—ईमान की गिरावट अंदर से शुरू होती है। अगर कोई लगातार नबी की बातों को झुठलाता है, तो यह रूहानी तौर पर ऐसा ज़ंग बन जाता है जो दिल को बर्बाद कर देता है।

✅ [238] विरोध की वजह से दिल का सख़्त हो जाना

यह बात समझ में आती है कि नबी का विरोध करने से इंसान का दिल सख़्त हो जाता है, और फिर वह हिदायत पाने की सलाहियत खो देता है। ऐसे लोग जो हुज़ूर ﷺ से कोई ताल्लुक़ नहीं रखते, उनका क़ुरआन को समझना भी एकतरफा और ग़लत दिशा में चला जाता है। अल्लाह हमें इस बदक़िस्मती से बचाए और हमारे दिलों को हक़ के लिए नरम और कुबूल करने वाला बनाए।

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