और हमने उनमें से अधिकांश को वचन का सच्चा नहीं पाया [239], बल्कि हमने तो उनमें से अधिकतर को हद्द से बढ़ने वाला पाया।
यह आयत उन लोगों की मुनाफ़िक़त को उजागर करती है जो मुसीबत के वक़्त वादे तो करते हैं, लेकिन जैसे ही आसानी मिलती है, वो अपने वादे तोड़ देते हैं। मक्का के कुफ्फ़ार जब किसी मुश्किल में फँसते, तो कहते कि अगर अल्लाह ने उन्हें बचा लिया तो वे ईमान ले आएँगे, लेकिन जब राहत मिल जाती, तो वही कुफ्र और नाफ़रमानी की राह फिर से पकड़ लेते। यह रवैया इख़लास की कमी और गहरी नैतिक गिरावट को दर्शाता है—ऐसे लोग अल्लाह को मुसीबत में याद करते हैं, मगर मोहब्बत और बंदगी से नहीं।
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सूरह अल-आराफ आयत 102 तफ़सीर