कुरान - 7:144 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

144
قَالَ يَٰمُوسَىٰٓ إِنِّي ٱصۡطَفَيۡتُكَ عَلَى ٱلنَّاسِ بِرِسَٰلَٰتِي وَبِكَلَٰمِي فَخُذۡ مَآ ءَاتَيۡتُكَ وَكُن مِّنَ ٱلشَّـٰكِرِينَ

Transliteration: (Qaala yaa Moosaaa innis tafaituka 'alan naasi bi Risaalaatee wa bi kalaamee fakhuz maaa aataituka wa kum minash shaakireen)

अल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ मूसा! मैंने तुझे लोगों में से अपनी पैग़म्बरी और अपने कलाम [313] के लिए चुन लिया है। सो, जो कुछ मैंने तुझे दिया है उसे मज़बूती से ले और शुक्रगुज़ार रह।” (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 144 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ‘राफ़ – आयत 144 की तफ़्सीर

✅ [313] मूसा (अ.स.) का ख़ास चुनाव

इस आयत में अल्लाह ने ऐलान किया कि मूसा (अलैहिस्सलाम) को दो बड़ी नेमतों के लिए चुना गया:

  • रसालत (पैग़म्बरी और शरीअत की जिम्मेदारी)
  • कलामुल्लाह (सीधे अल्लाह से बातचीत का शरफ़)

हारून (अ.स.) भी नबी थे, मगर क़ानून-ए-इलाही (तौरात) सिर्फ मूसा (अ.स.) को दिया गया। यह उनकी ख़ास मरतबा (विशेष स्थान) की दलील है।

हज़रत मुहम्मद ﷺ को भी अल्लाह ने मीराज़ की रात अपने दीदार और कलाम से नवाज़ा, लेकिन यह अलग अंदाज़ और अलग मिशन के मुताबिक़ था।

अंत में अल्लाह ने मूसा (अ.स.) को ताकीद की कि इतनी बड़ी नेमत पर हमेशा शुक्र अदा करते रहो, क्योंकि शुक्रगुज़ारी ही अल्लाह की रहमत और इनायत को क़ायम रखती है।

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