Transliteration: (Wa lammaa jaaa'a Moosa limeeqaatinaa wa kallamahoo Rabbuhoo qaala Rabbi arineee anzur ilaik; qaala lan taraanee wa laakininzur ilal jabali fa inistaqarra makaanahoo fasawfa taraanee; falammaa tajallaa Rabbuhoo liljabali ja'alahoo dakkanw wa kharra Moosaa sa'iqaa; falammaaa afaaqa qaala Subhaanaka tubtu ilaika wa ana awwalul mu'mineen)
मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के दर्शन की दरख्वास्त मोहब्बत और शौक़ से की, न कि शक़ या नाफ़रमानी से। बनी-इसराईल ने अहंकार में अल्लाह को देखने की जिद की थी, जबकि मूसा की ख्वाहिश उनकी रूहानी बुलंदी से निकली थी।
अल्लाह ने फरमाया कि इस दुनिया में इंसान उनकी ज़ात का दीदार बर्दाश्त नहीं कर सकता। मगर इस इशारे से पता चलता है कि क़ियामत के दिन ईमान वाले अल्लाह का दीदार करेंगे। मूसा को कलाम का शरफ़ मिला और हज़रत मुहम्मद ﷺ को दीदार का शरफ़ मिलेगा।
अल्लाह ने अपनी ज़ाती रोशनी नहीं, बल्कि अपने नूर की एक झलक पहाड़ पर डाली। वह मामूली सी झलक भी पहाड़ को चकनाचूर कर गई। इससे मालूम हुआ कि मख़लूक़ अल्लाह की हक़ीक़ी ज़ात को सहन नहीं कर सकती।
मूसा (अ.स.) अल्लाह की जलवा-नुमाई से बेहोश हो गए। इससे साबित हुआ कि नबी पर बेहोशी या बेख़ुदी की हालत आ सकती है। जैसे औलिया अल्लाह रूहानी कैफ़ियत में बेख़ुद हो जाते हैं।
होश आने पर मूसा ने कहा: “तू पाक है, मैं तेरी तरफ रुजू करता हूँ।” यह तौबा गुनाह से नहीं बल्कि अदब और मोहब्बत से थी कि उन्होंने इतनी बड़ी दरख्वास्त की थी।
हालाँकि दुनिया में दीदार नामुमकिन था, फिर भी अल्लाह ने मूसा की ख्वाहिश का सबसे आला अंदाज़ में जवाब दिया। और जब मूसा ने कहा: “मैं ईमान लाने वालों में पहला हूँ” तो मतलब था कि अपनी क़ौम में सबसे पहले पूरा समर्पण करने वाला हूँ।
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