Transliteration: (Wa iz anjainaakum min Aali Fir'awna yasoomoo nakum sooo'al 'azaab, yuqattiloona abnaaa'akum wa yastahyoona nisaaa'akum; wa fee zaalikum balaaa'um mir Rabbikum 'azeem)
इस आयत में बनी इस्राईल (या नबी ﷺ के ज़माने के यहूद) को फ़िरऔन के ज़ुल्म से नजात की याद दिलाई गई। फ़िरऔन के सिपाही और हाकिम उनके ऊपर सख़्तियाँ ढाते थे, मगर अल्लाह ने अपनी रहमत से उन्हें छुटकारा दिया। यहाँ यह इशारा भी है कि सिर्फ़ उस वक़्त की नस्ल ही नहीं, बल्कि उनकी रूहानी औलाद भी इस तज़किरा में शामिल है।
फ़िरऔन की सियासत यह थी कि वह बनी इस्राईल के बेटों को क़त्ल कर देता, ताकि उनकी क़ौम कमज़ोर हो जाए। लेकिन बेटियों को ज़िन्दा रखता ताकि उन्हें ख़ादिमा और मज़दूर बनाया जा सके। यह किसी रहम की वजह से नहीं, बल्कि सिर्फ़ शोषण और हुकूमत को मज़बूत करने की चाल थी।
उन पर होने वाला यह नजात अल्लाह की बड़ी नेमत थी। इस सिलसिले में यह भी याद दिलाया गया कि बाद में मूसा (अलैहिस्सलाम) को तौरात देने का मौक़ा मिला। उन्होंने 30 रोज़े (ज़िल-क़ादा में) रखे और जब उन्होंने मिस्वाक़ किया तो अल्लाह ने हुक्म दिया कि 10 और रोज़े रखो, जिससे कुल 40 दिन पूरे हुए। उसी दौरान उन्हें लौहे की तख़्तियाँ (तौरात) 10 ज़िल-हिज्जा को अता की गईं। इससे मालूम होता है कि चालीस दिन का अरसा इबादत और अल्लाह से क़ुरबत हासिल करने के लिए बहुत असरदार होता है, और यह भी कि मिस्वाक़ रोज़े को नहीं तोड़ती, क्योंकि यह हुक्म सिर्फ़ मूसा (अलैहिस्सलाम) के लिए ख़ास था।
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