कुरान - 7:140 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

140
قَالَ أَغَيۡرَ ٱللَّهِ أَبۡغِيكُمۡ إِلَٰهٗا وَهُوَ فَضَّلَكُمۡ عَلَى ٱلۡعَٰلَمِينَ

Transliteration: (Qaala a-ghairal laahi abgheekum ilaahanw wa Huwa faddalakum 'alal 'aalameen)

उन्होंने कहा: "क्या मैं अल्लाह के सिवा तुम्हारे लिए कोई और इलबाह (माबूद/माबूद) तलाश करूँ [298], जबकि उसी ने तुम्हें दुनिया जहान के सब लोगों पर फ़ज़ीलत बख़्शी है [299]?" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 140 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आराफ़ – आयत 140 की तफ़्सीर

✅ [298] असल नेमतें देने वाला ही माबूद है

मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उनकी ग़लत दरख़्वास्त को सख़्ती से ठुकरा दिया और समझाया कि अल्लाह को ढूँढने या गढ़ने की ज़रूरत नहीं है। वही तो है जिसने नेमतें अता कीं, इज़्ज़त दी और बुलंदी बख़्शी। माबूद वही हो सकता है जो रिज़्क़ देने वाला और तरक़्क़ी बख़्शने वाला हो, न कि इंसानों के बनाए बुत। इसलिए अल्लाह के अलावा किसी और को पूजना हक़ीक़ी तौर पर जाहिलाना और बेवक़ूफ़ी है।

✅ [299] नसब (वंश) की इज़्ज़त और ईमान की क़ीमत

इस आयत से दो अहम सबक़ मिलते हैं:

  1. बनी इस्राईल को पैग़़म्बरों की नस्ल से होने की वजह से अल्लाह ने इज़्ज़त और फ़ज़ीलत बख़्शी।
  2. नसब (वंश) एक नेमत है, मगर सिर्फ़ ईमान के साथ। अगर ईमान न हो तो नसब की कोई क़ीमत नहीं रहती।

यहाँ बनी इस्राईल को उनके मुक़ाम और फ़ज़ीलत की याद दिलाई गई, ताकि वे गुमराही से बाज़ आएँ। इससे ये भी साबित होता है कि कभी-कभार ग़लत ख़याल या ग़लती से कुफ़्र जैसी बात ज़बान पर आ जाए तो वह तुरंत कुफ़्र नहीं बनती, जब तक दिल में हक़ से रुख़्सती और इनकार न हो।

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