Transliteration: (Qaala a-ghairal laahi abgheekum ilaahanw wa Huwa faddalakum 'alal 'aalameen)
मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उनकी ग़लत दरख़्वास्त को सख़्ती से ठुकरा दिया और समझाया कि अल्लाह को ढूँढने या गढ़ने की ज़रूरत नहीं है। वही तो है जिसने नेमतें अता कीं, इज़्ज़त दी और बुलंदी बख़्शी। माबूद वही हो सकता है जो रिज़्क़ देने वाला और तरक़्क़ी बख़्शने वाला हो, न कि इंसानों के बनाए बुत। इसलिए अल्लाह के अलावा किसी और को पूजना हक़ीक़ी तौर पर जाहिलाना और बेवक़ूफ़ी है।
इस आयत से दो अहम सबक़ मिलते हैं:
यहाँ बनी इस्राईल को उनके मुक़ाम और फ़ज़ीलत की याद दिलाई गई, ताकि वे गुमराही से बाज़ आएँ। इससे ये भी साबित होता है कि कभी-कभार ग़लत ख़याल या ग़लती से कुफ़्र जैसी बात ज़बान पर आ जाए तो वह तुरंत कुफ़्र नहीं बनती, जब तक दिल में हक़ से रुख़्सती और इनकार न हो।
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