कुरान - 7:138 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

138
وَجَٰوَزۡنَا بِبَنِيٓ إِسۡرَـٰٓءِيلَ ٱلۡبَحۡرَ فَأَتَوۡاْ عَلَىٰ قَوۡمٖ يَعۡكُفُونَ عَلَىٰٓ أَصۡنَامٖ لَّهُمۡۚ قَالُواْ يَٰمُوسَى ٱجۡعَل لَّنَآ إِلَٰهٗا كَمَا لَهُمۡ ءَالِهَةٞۚ قَالَ إِنَّكُمۡ قَوۡمٞ تَجۡهَلُونَ

Transliteration: (Wa jaawaznaa bi Banneee Israaa'eelal bahra fa ataw 'alaa qawminy ya'kufoona 'alaaa asnaamil lahum; qaaloo yaa Moosaj'al lanaa ilaahan kamaa lahum aalihah; qaala innakum qawmun tajhaloon)

उन्होंने बनी इस्राईल को दरिया पार कराया [293]। फिर वे एक ऐसी क़ौम के पास आए जो अपने बुतों के सामने बैठे इबादत कर रही थी [294]। उन्होंने कहा: "ऐ मूसा, हमारे लिए भी एक माबूद बना दो जैसे उनके माबूद हैं [295]।" मूसा ने कहा: "निस्संदेह तुम लोग अज्ञानता में पड़े हुए हो [296]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 138 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आराफ़ – आयत 138 की तफ़्सीर

✅ [293] बनी इस्राईल का दरिया पार करना

यहाँ "दरिया" से लाल सागर (Red Sea) मुराद है, न कि नील नदी। यह गुज़रना क़ुलज़ुम नामी जगह पर हुआ, जो मक़्का और मिस्र के बीच और तौर पर्वत (Mount Sinai) के क़रीब है। बनी इस्राईल ने यह दरिया 10 मुहर्रम (आशूरा) के दिन पार किया। इसी वजह से इस दिन की याद और रोज़ा रखना सुन्नत बना।

✅ [294] बुतपरस्तों से आमना-सामना

दरिया पार करने के बाद बनी इस्राईल की मुलाक़ात अमालिक़ा नामक क़ौम से हुई। ये लोग गाय के आकार के बुतों की पूजा करते थे। इस नज़ारे ने बनी इस्राईल के कुछ लोगों में बुतपरस्ती का झुकाव पैदा किया। बाद में यही रुझान मूसा (अलैहिस्सलाम) की ग़ैरहाज़िरी में बछड़े की पूजा की शक्ल में ज़ाहिर हुआ।

✅ [295] अज्ञानता से निकला हुआ सवाल

यह दरख़्वास्त पूरी क़ौम की तरफ़ से नहीं बल्कि एक छोटे से गिरोह की तरफ़ से थी, जो अभी ईमान की हक़ीक़त को पूरी तरह नहीं समझ पाए थे। उनकी ये बात अज्ञानता और जज़्बाती असर की वजह से थी, न कि खुली कुफ़्रपसंदी। इसी लिए मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें मुर्तद (ईमान छोड़ने वाला) नहीं कहा, न सज़ा दी और न तौबा का हुक्म दिया।

✅ [296] इंसान की भूलने की फ़ितरत

मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अफ़सोस के साथ कहा कि इतने सारे मोजिज़ात (चमत्कार) देखने के बावजूद भी तुम लोग अल्लाह को ही इकलौता माबूद नहीं पहचानते। यह इंसान की फ़ितरत है कि वह बार-बार देखे और समझे गए सबक को भी भूल जाता है। इसलिए हमेशा अल्लाह की याद और ग़ौर व फ़िक्र ज़रूरी है ताकि इंसान गुमराही से बचा रहे।

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