Transliteration: (Wa jaawaznaa bi Banneee Israaa'eelal bahra fa ataw 'alaa qawminy ya'kufoona 'alaaa asnaamil lahum; qaaloo yaa Moosaj'al lanaa ilaahan kamaa lahum aalihah; qaala innakum qawmun tajhaloon)
यहाँ "दरिया" से लाल सागर (Red Sea) मुराद है, न कि नील नदी। यह गुज़रना क़ुलज़ुम नामी जगह पर हुआ, जो मक़्का और मिस्र के बीच और तौर पर्वत (Mount Sinai) के क़रीब है। बनी इस्राईल ने यह दरिया 10 मुहर्रम (आशूरा) के दिन पार किया। इसी वजह से इस दिन की याद और रोज़ा रखना सुन्नत बना।
दरिया पार करने के बाद बनी इस्राईल की मुलाक़ात अमालिक़ा नामक क़ौम से हुई। ये लोग गाय के आकार के बुतों की पूजा करते थे। इस नज़ारे ने बनी इस्राईल के कुछ लोगों में बुतपरस्ती का झुकाव पैदा किया। बाद में यही रुझान मूसा (अलैहिस्सलाम) की ग़ैरहाज़िरी में बछड़े की पूजा की शक्ल में ज़ाहिर हुआ।
यह दरख़्वास्त पूरी क़ौम की तरफ़ से नहीं बल्कि एक छोटे से गिरोह की तरफ़ से थी, जो अभी ईमान की हक़ीक़त को पूरी तरह नहीं समझ पाए थे। उनकी ये बात अज्ञानता और जज़्बाती असर की वजह से थी, न कि खुली कुफ़्रपसंदी। इसी लिए मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें मुर्तद (ईमान छोड़ने वाला) नहीं कहा, न सज़ा दी और न तौबा का हुक्म दिया।
मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अफ़सोस के साथ कहा कि इतने सारे मोजिज़ात (चमत्कार) देखने के बावजूद भी तुम लोग अल्लाह को ही इकलौता माबूद नहीं पहचानते। यह इंसान की फ़ितरत है कि वह बार-बार देखे और समझे गए सबक को भी भूल जाता है। इसलिए हमेशा अल्लाह की याद और ग़ौर व फ़िक्र ज़रूरी है ताकि इंसान गुमराही से बचा रहे।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat