Transliteration: (Wa awrasnal qawmal lazeena kaanoo yustad'afoona mashaariqal ardi wa maghaari bahal latee baaraknaa feehaa wa tammat kalimatu Rabbikal husnaa 'alaa Baneee Israaa'eela bimaa sabaroo wa dammarnaa maa kaana yasna'u Fir'awnu wa qawmuhoo wa maa kaanoo ya'rishoon)
फ़िरऔन के डूब जाने के बाद, इसराईली — जो पहले गुलाम और सताए हुए थे — पूरी ज़मीन के मालिक बना दिए गए। "पूर्व और पश्चिम" पूरे इलाके की तसवीर पेश करता है। यहाँ "वारिस" का मतलब है कि उनकी मिल्कियत अल्लाह के हुक्म से उन्हें मिल गई, जो ताक़त का पूरा उलटाव था।
वह ज़मीन बरकतों से भरपूर थी, दुनिया और आख़िरत दोनों के लिहाज़ से। ख़ासकर शाम (सिरिया) और फ़िलस्तीन, जहाँ फल और खेती बहुत हैं, और जहाँ अंबिया की क़ब्रें और मक़ामाते-मुक़द्दसा (जैसे कि इस्रा व मी'राज़ की शुरुआत) मौजूद हैं। यह नेअमतें सिर्फ़ दुनियावी नहीं बल्कि रूहानी बरकतें भी थीं।
अल्लाह का वादा हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) से पूरा हुआ और बनी इसराईल को इज़्ज़त और नजात मिली। यह उनके सब्र का नतीजा था। इस आयत से सबक़ मिलता है कि अल्लाह अपने पैग़म्बरों और उनके मानने वालों से किया गया वादा ज़रूर पूरा करता है।
फ़िरऔन और उसकी क़ौम ने जो कुछ बनाया था — बाग़ात, महल और इमारतें — सब मिटा दी गईं। बनी इसराईल ने उन्हें सीधे तौर पर विरासत में नहीं पाया, बल्कि वह सब पहले ही उजाड़ दिया गया था। यह सिर्फ़ अज़ाबे-इलाही नहीं था बल्कि एक तहरीरी सफ़ाया भी था ताकि ज़ालिमों की निशानियाँ मिट जाएँ और नया दौर शुरू हो सके।
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