कुरान - 7:137 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

137
وَأَوۡرَثۡنَا ٱلۡقَوۡمَ ٱلَّذِينَ كَانُواْ يُسۡتَضۡعَفُونَ مَشَٰرِقَ ٱلۡأَرۡضِ وَمَغَٰرِبَهَا ٱلَّتِي بَٰرَكۡنَا فِيهَاۖ وَتَمَّتۡ كَلِمَتُ رَبِّكَ ٱلۡحُسۡنَىٰ عَلَىٰ بَنِيٓ إِسۡرَـٰٓءِيلَ بِمَا صَبَرُواْۖ وَدَمَّرۡنَا مَا كَانَ يَصۡنَعُ فِرۡعَوۡنُ وَقَوۡمُهُۥ وَمَا كَانُواْ يَعۡرِشُونَ

Transliteration: (Wa awrasnal qawmal lazeena kaanoo yustad'afoona mashaariqal ardi wa maghaari bahal latee baaraknaa feehaa wa tammat kalimatu Rabbikal husnaa 'alaa Baneee Israaa'eela bimaa sabaroo wa dammarnaa maa kaana yasna'u Fir'awnu wa qawmuhoo wa maa kaanoo ya'rishoon)

और हमने उन लोगों को, जो पहले से पीड़ित थे, ज़मीन के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों [289] का वारिस बना दिया, जिनमें हमने अपनी बरकतें रखी थीं [290]। और तुम्हारे रब का नेक वादा बनी इसराईल के हक़ में पूरा हुआ [291], उनके सब्र के बदले। और हमने फ़िरऔन और उसकी क़ौम की बनाई हुई चीज़ों और उनकी ऊँची इमारतों को तबाह कर दिया [292]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 137 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ़राफ़ – आयत 137 की तफ़्सीर

✅ [289] मज़लूमों को वारिस बनाया गया

फ़िरऔन के डूब जाने के बाद, इसराईली — जो पहले गुलाम और सताए हुए थे — पूरी ज़मीन के मालिक बना दिए गए। "पूर्व और पश्चिम" पूरे इलाके की तसवीर पेश करता है। यहाँ "वारिस" का मतलब है कि उनकी मिल्कियत अल्लाह के हुक्म से उन्हें मिल गई, जो ताक़त का पूरा उलटाव था।

✅ [290] बरकतों वाली ज़मीन

वह ज़मीन बरकतों से भरपूर थी, दुनिया और आख़िरत दोनों के लिहाज़ से। ख़ासकर शाम (सिरिया) और फ़िलस्तीन, जहाँ फल और खेती बहुत हैं, और जहाँ अंबिया की क़ब्रें और मक़ामाते-मुक़द्दसा (जैसे कि इस्रा व मी'राज़ की शुरुआत) मौजूद हैं। यह नेअमतें सिर्फ़ दुनियावी नहीं बल्कि रूहानी बरकतें भी थीं।

✅ [291] सब्र का इनाम – वादा पूरा

अल्लाह का वादा हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) से पूरा हुआ और बनी इसराईल को इज़्ज़त और नजात मिली। यह उनके सब्र का नतीजा था। इस आयत से सबक़ मिलता है कि अल्लाह अपने पैग़म्बरों और उनके मानने वालों से किया गया वादा ज़रूर पूरा करता है।

✅ [292] फ़िरऔन की शान का पतन

फ़िरऔन और उसकी क़ौम ने जो कुछ बनाया था — बाग़ात, महल और इमारतें — सब मिटा दी गईं। बनी इसराईल ने उन्हें सीधे तौर पर विरासत में नहीं पाया, बल्कि वह सब पहले ही उजाड़ दिया गया था। यह सिर्फ़ अज़ाबे-इलाही नहीं था बल्कि एक तहरीरी सफ़ाया भी था ताकि ज़ालिमों की निशानियाँ मिट जाएँ और नया दौर शुरू हो सके।

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