कुरान - 7:146 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

146
سَأَصۡرِفُ عَنۡ ءَايَٰتِيَ ٱلَّذِينَ يَتَكَبَّرُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِ بِغَيۡرِ ٱلۡحَقِّ وَإِن يَرَوۡاْ كُلَّ ءَايَةٖ لَّا يُؤۡمِنُواْ بِهَا وَإِن يَرَوۡاْ سَبِيلَ ٱلرُّشۡدِ لَا يَتَّخِذُوهُ سَبِيلٗا وَإِن يَرَوۡاْ سَبِيلَ ٱلۡغَيِّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلٗاۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ كَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِنَا وَكَانُواْ عَنۡهَا غَٰفِلِينَ

Transliteration: (Sa asrifu 'an Aayaatiyal lazeena yatakabbaroona fil ardi bighairil haqq; wa iny-yaraw kulla Aayatil laa yu'minoo bihaa wa iny-yaraw sabeelar rushdi laa yattakhizoohu sabeelanw wa iny-yaraw sabeelal ghaiyi yattakhizoohu sabeelaa; zaalika bi annahum kazzaboo bi Aayaatinaa wa kaanoo 'anhaa ghaafileen)

“और मैं बहुत जल्द अपनी निशानियों को उन लोगों से हटा दूँगा जो ज़मीन में ना-हक़ घमंड करते हैं [317]। और अगर वे सारी निशानियाँ देख भी लें, तो भी उन पर ईमान नहीं लाएँगे। और अगर उन्हें हिदायत का रास्ता नज़र आए, तो भी वे उसे अपनाना पसंद नहीं करेंगे [318]। लेकिन अगर उन्हें गुमराही का रास्ता नज़र आए, तो उसी को अपना लेंगे। ये सब इसलिए है कि उन्होंने हमारी निशानियों को झुठला दिया और ऐसे बन गए जैसे कि वे जानते ही नहीं [319]।” (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 146 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ‘राफ़ – आयत 146 की तफ़्सीर

✅ [317] घमंड – अल्लाह की निशानियों से महरूमी

अल्लाह चेतावनी देता है कि जो लोग ज़मीन में ना-हक़ तकब्बुर करते हैं, उनसे इलाही निशानियों से फायदा उठाने की तौफ़ीक़ छीन ली जाती है। अल्लाह के नेक बंदों, नबियों और औलिया के सामने घमंड करना दरअसल अल्लाह के ख़िलाफ़ बग़ावत है — और यही तकब्बुर शैतान की भी ख़ासियत थी।

✅ [318] तकब्बुर – हिदायत की रुकावट

जो दिल घमंड से भर जाए, वह हक़ को देख कर भी इनकार कर देता है। ऐसे लोग तमाम मोजिज़े और निशानियाँ देखने के बावजूद ईमान नहीं लाते। उन्हें हिदायत का रास्ता नापसंद लगता है, जबकि गुमराही का रास्ता उन्हें भाता है, क्योंकि उनका नफ़्स उन्हें सच्चाई के सामने झुकने नहीं देता।

✅ [319] निशानियों का इनकार – रसूल का इनकार

यहाँ “निशानियाँ” से मुराद मोजिज़े भी हैं और नबी व रसूल भी। जिन्होंने जान-बूझ कर अल्लाह की आयतों को झुठलाया और ऐसा दिखाया जैसे वे अनजान हैं — वे हक़ से कट गए। दरअसल, नबी ﷺ को न मानना कुरआन की सारी हिदायत से महरूम होना है। क्योंकि पहले रसूल पर ईमान लाना ज़रूरी है, फिर ही इंसान कुरआन से सही हिदायत पा सकता है।

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