Transliteration: (Sa asrifu 'an Aayaatiyal lazeena yatakabbaroona fil ardi bighairil haqq; wa iny-yaraw kulla Aayatil laa yu'minoo bihaa wa iny-yaraw sabeelar rushdi laa yattakhizoohu sabeelanw wa iny-yaraw sabeelal ghaiyi yattakhizoohu sabeelaa; zaalika bi annahum kazzaboo bi Aayaatinaa wa kaanoo 'anhaa ghaafileen)
अल्लाह चेतावनी देता है कि जो लोग ज़मीन में ना-हक़ तकब्बुर करते हैं, उनसे इलाही निशानियों से फायदा उठाने की तौफ़ीक़ छीन ली जाती है। अल्लाह के नेक बंदों, नबियों और औलिया के सामने घमंड करना दरअसल अल्लाह के ख़िलाफ़ बग़ावत है — और यही तकब्बुर शैतान की भी ख़ासियत थी।
जो दिल घमंड से भर जाए, वह हक़ को देख कर भी इनकार कर देता है। ऐसे लोग तमाम मोजिज़े और निशानियाँ देखने के बावजूद ईमान नहीं लाते। उन्हें हिदायत का रास्ता नापसंद लगता है, जबकि गुमराही का रास्ता उन्हें भाता है, क्योंकि उनका नफ़्स उन्हें सच्चाई के सामने झुकने नहीं देता।
यहाँ “निशानियाँ” से मुराद मोजिज़े भी हैं और नबी व रसूल भी। जिन्होंने जान-बूझ कर अल्लाह की आयतों को झुठलाया और ऐसा दिखाया जैसे वे अनजान हैं — वे हक़ से कट गए। दरअसल, नबी ﷺ को न मानना कुरआन की सारी हिदायत से महरूम होना है। क्योंकि पहले रसूल पर ईमान लाना ज़रूरी है, फिर ही इंसान कुरआन से सही हिदायत पा सकता है।
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