Transliteration: (Wattakhaza qawmu Moosaa mim ba'dihee min huliyyihim 'ijlan jasadal lahoo khuwaar; alam yaraw annahoo laa yukallimuhum wa laa yahdeehim sabeelaa; ittakhazoohu wa kaanoo zaalimeen)
जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तूर पर्वत पर गए, तो सामरी ने बनी इस्राईल से लिए गए गहनों से सोने का बछड़ा तैयार किया। ये गहने मूल रूप से फ़िरऔन की क़ौम के थे, लेकिन बनी इस्राईल के पास आ गए थे। चूँकि पूरी क़ौम ने इसमें हिस्सा लिया, इसलिए इसे सामूहिक तौर पर उनका काम कहा गया।
वह बछड़ा बेजान था, लेकिन उसमें से गाय जैसी आवाज़ निकलती थी। तफ़्सीर में आता है कि सामरी ने हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम के घोड़े के खुर की ख़ाक उसके मुँह में डाल दी थी, जिससे उसमें यह झूठी हरकत पैदा हुई। मगर चूँकि इसका ज़रिया नापाक ज़र था, इसलिए नतीजा गुमराही ही निकला।
बनी इस्राईल अच्छी तरह जानते थे कि उनका रब सुनता है, बोलता है और हिदायत देता है। इसके बावजूद उन्होंने एक गूँगे-बेकार बुत को पूज लिया। इससे साबित होता है कि सिर्फ़ इल्म काफ़ी नहीं, बल्कि इख़लास और सच्चाई भी ज़रूरी है।
जिब्रईल अलैहिस्सलाम के खुर की ख़ाक में असल में बरकत थी, लेकिन उसे सोने के बुत में डालना गुमराही का सबब बना। यह इस बात की मिसाल है कि अगर इल्म और करामात ग़लत हाथों में पड़ जाएँ तो लोगों को भटका सकते हैं।
बनी इस्राईल ने उस बछड़े की इबादत नाच-गाने और रस्मों के साथ की। तफ़्सीर रूहुल बयान के मुताबिक़, इस तरह का दिखावटी जोश और बनावटी इबादत असल में गुमराहों की राह है। जबकि औलिया का इश्क़ और हालात अल्लाह से जुड़े हुए, पाक और सच्चे होते हैं। यही वजह है कि अल्लाह ने उनके इस अमल को ज़ुल्म कहा।
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