Transliteration: (Wa lammaa raja'a Moosaaa ilaa qawmihee ghadbaana asifan qaala bi'samaa khalaftumoonee min ba'dee 'a-'ajiltum amra Rabbikum wa alqal alwaaha wa akhaza bira'si akheehi yajurruhoo ilaiyh; qaalab na umma innal qawmas tad'afoonee wa kadoo yaqtu loonanee; falaa tushmit biyal a'daaa'a wa laa taj'alnee ma'al qawmiz zaalimeen)
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) जब लौटे तो उन्हें सामरी और उसकी गुमराही पर शदीद ग़ुस्सा आया। यह ग़ुस्सा उनके भाई हारून (अलैहिस्सलाम) पर नहीं था, बल्कि अल्लाह के लिए था।
उन्होंने अपनी क़ौम और हारून (अलैहिस्सलाम) दोनों को संबोधित किया। इससे सबक़ मिलता है कि सिर्फ़ अपनी इस्लाह काफ़ी नहीं, बल्कि दूसरों की इस्लाह की कोशिश करना भी ज़रूरी है।
मूसा (अलैहिस्सलाम) ने ग़ुस्से में तौरात की तख़्तियाँ पटक दीं। यह अल्लाह की किताब की बेअदबी के लिए नहीं था, बल्कि ग़ुस्से के जज़्बात में हुआ। अल्लाह के लिए ग़ुस्सा करना इमान की निशानी है।
हारून (अलैहिस्सलाम) उनसे उम्र में बड़े थे, मगर पैग़म्बराना ज़िम्मेदारी में मूसा (अलैहिस्सलाम) को उनसे अफ़ज़लियत हासिल थी। ग़ुस्से में उन्होंने हारून को खींचा और दाढ़ी पकड़ ली। यह इस बात की दलील है कि अल्लाह के लिए ग़ुस्सा करते हुए इंसान कभी-कभी बेइख़्तियार हो जाता है।
हारून (अलैहिस्सलाम) ने कहा कि क़ौम ने उन्हें कमज़ोर समझा और क़त्ल करने के क़रीब हो गए। इस वजह से उन्होंने चुप्पी इख़्तियार की ताकि मामला और बिगड़े नहीं। इससे सबक़ है कि अगर दावत (tabligh) देने से जान का ख़तरा हो, तो उस वक़्त खामोशी इख़्तियार करना जायज़ है।
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