कुरान - 7:184 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

184
أَوَلَمۡ يَتَفَكَّرُواْۗ مَا بِصَاحِبِهِم مِّن جِنَّةٍۚ إِنۡ هُوَ إِلَّا نَذِيرٞ مُّبِينٌ

Transliteration: (Awalam yatafakkaroo maa bisaahibihim min jinnah; in huwa illaa nazeerun mubeen)

क्या ये लोग ग़ौर नहीं करते कि उनका साथी (पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ) दीवानगी से ग्रस्त नहीं है? वह तो सिर्फ़ एक खुला हुआ डर सुनाने वाला है [418]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 184 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरा अल-आ़राफ़ – आयत 184 की तफ़्सीर

✅ [418] पैग़म्बरों की अकल और पैग़ाम की सफ़ाई

  1. पैग़म्बर और पागलपन – अल्लाह के पैग़म्बर कभी दीवाने, गूंगे या बहरे नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हें अल्लाह ने अपनी पैग़ाम-रिसानी (संदेश पहुँचाने) के लिए चुना है।
  2. मूसा (अ.स.) का बेहोश होना – यह कोई कमी नहीं थी, बल्कि अल्लाह की जलालमयी झलक देखने से था, जैसे नींद इंसान को बेहोश कर देती है।
  3. मुहम्मद ﷺ की सच्चाई – क़ुरैश के लोग जानते थे कि पैग़म्बर ﷺ अक्लमंद, सच्चे और अमानतदार हैं, इसलिए दीवानगी का इल्ज़ाम महज़ हठधर्मी थी।

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