कुरान - 7:2 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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كِتَٰبٌ أُنزِلَ إِلَيۡكَ فَلَا يَكُن فِي صَدۡرِكَ حَرَجٞ مِّنۡهُ لِتُنذِرَ بِهِۦ وَذِكۡرَىٰ لِلۡمُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Kitaabun unzila ilaika falaa yakun fee sadrika harajum minhu litunzira bihee wa zikraa lilmu'mineen)

यह एक किताब है जो आप पर उतारी गई है, अतः इसमें आपके दिल में कोई संकट या संकोच न हो, ताकि आप इसके द्वारा चेतावनी दें, और यह ईमान वालों के लिए एक नसीहत है [2] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ'राफ़ – आयत 2 की तफ़्सीर

 

✅ [1] कोई संकोच न हो यानी प्रचार में हिचक न हो

किसी रुकावट का न होना का मतलब है कि इसके प्रचार में कोई हिचकिचाहट न हो और काफ़िरों की विरोधी बातों की कोई परवाह न की जाए। यह संबोधन ज़ाहिरा तौर पर रसूल ﷺ से है, लेकिन वास्तव में इसमें पूरी उम्मत के दाई शामिल हैं। क्योंकि रसूल ﷺ ने कभी सत्य और दावत के मामले में हिचकिचाहट या भय नहीं दिखाया। उनका दर्जा इससे बहुत ऊँचा है। बल्कि जिन पर उनकी रूहानी कृपा होती है, वे दुनियावी दबाव से बेपरवाह होकर विश्वास और आत्मबल के साथ संदेश पहुँचाते हैं।

✅ [2] कुरआन की नसीहत ईमान वालों के लिए है

ईमान वालों के लिए नसीहत का मतलब यह है कि कुरआन मुसलमानों को नेक अमल और अख़्लाक़ी सुधार की तरफ़ बुलाता है। काफ़िर इसकी नसीहत के मक़सद नहीं, क्योंकि या तो वे इसे मानते ही नहीं या इसकी असल फ़ायदा सिर्फ़ ईमान वाले ही उठा सकते हैं। दूसरे अर्थ में यह भी हो सकता है कि कुरआन पूरी इंसानियत के लिए है, लेकिन उसकी रूहानी बरकत सिर्फ़ मुसलमानों को हासिल होती है। इस तरह इसमें कोई विरोधाभास नहीं, क्योंकि हिदायत आम है मगर फ़ायदा सिर्फ़ ईमान वालों को मिलता है।

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