फिर उसने उन्हें धोखे में डाल दिया [38] और जब उन्होंने उस पेड़ को चखा, तो उनकी शर्मगाहें उन्हें ज़ाहिर हो गईं [39] और वे जन्नत के पत्तों से अपने ऊपर पर्दा डालने लगे [40] और उनके रब ने उन्हें पुकारा: क्या मैंने तुम्हें इस पेड़ से मना नहीं किया था [41] और यह नहीं बताया था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है? [42]...
इससे मालूम होता है कि हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) से कोई गुनाह नहीं हुआ, क्योंकि गुनाह के लिए नीयत ज़रूरी होती है। जो कुछ भी हुआ वह भूल के कारण हुआ, इसलिए शैतान ज़िम्मेदार ठहराया गया। जो कोई हज़रत आदम को गुनहगार समझता है, वह गुमराह है।
हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को यह गुमान भी नहीं था कि अल्लाह का कोई बंदा झूठी क़सम खा सकता है। फिर भी उन्होंने उस पेड़ को खाया नहीं, बल्कि सिर्फ़ थोड़ा-सा चखा, और उसी वजह से उनका जन्नती लिबास उतर गया।
इससे पहले हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) का पूरा बदन नाखून जैसे लिबास से ढका हुआ था, लेकिन इस भूल के बाद वह सिकुड़कर सिर्फ उंगलियों तक रह गया (तफ़्सीर रूहुल बयान)। इसके बाद उन्होंने और बीबी हव्वा ने अंजीर के पत्तों से अपना बदन ढाँपना शुरू किया।
इससे यह सीख मिलती है कि हज़रत आदम के ज़माने में भी बेपर्दगी को बुरा समझा जाता था। इंसानी फ़ितरत खुद बखुद बेपर्दगी को शर्मनाक समझती है, भले ही उस वक़्त तक कोई शरीअत ना आई हो।
ध्यान रहे कि फ़रिश्तों के सामने कोई पर्दा नहीं होता, मगर अल्लाह के सामने पर्दा और शर्म हाज़िर रहती है।
यह बात अहम है कि अल्लाह की डाँट और रोक टोक चखने के बाद आई, न कि पहले। यह सब इलाही हिकमत के तहत था, ताकि हज़रत आदम तजुर्बा करके सीखें।
"मगर तू भूल गया, और तूने दोस्त और दुश्मन में फ़र्क नहीं किया" – इस बात से ये सबक़ मिलता है कि असल कामयाबी यही है कि इंसान पहचान ले कि कौन सच्चा दोस्त है और कौन दुश्मन।
हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) ने शैतान की बनावटी नसीहत को सही समझा, और इसी में भूल हो गई। मगर इस वाक़ये में क़यामत तक के लिए इंसानों के लिए सबक़ छुपा है।
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सूरह अल-आराफ आयत 22 तफ़सीर