Transliteration: (Fawaswasa lahumash Shaitaanu liyubdiya lahumaa maa wooriya 'anhumaa min saw aatihimaa wa qaala maa nahaakumaa Rabbukumaa 'an haazihish shajarati illaaa an takoonaa malakaini aw takoonaa minal khaalideen)
इससे हमें यह सीख मिलती है कि शैतान के वस्वसों से कोई भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं, न समय की पाबंदी है और न स्थान की। हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के सच्चे बंदे थे और जन्नत जैसे पाक और महफूज़ मक़ाम में थे, फिर भी शैतान उन्हें और बीबी हव्वा को बहकाने में कामयाब हो गया। इसलिए इंसान को गुनाह के स्थानों से बचना चाहिए और हर वक़्त अल्लाह की पनाह माँगते रहना चाहिए।
यहाँ से यह भी साबित होता है कि नबी पर वस्वसा आ सकता है, मगर वे गुनाह नहीं करते और न ही गलत अक़ीदे अपनाते हैं, इसलिए आयत में कोई विरोध नहीं।
यहाँ से मालूम होता है कि उस समय तक हज़रत आदम और बीबी हव्वा ने एक-दूसरे की शर्मगाह नहीं देखी थी। इससे यह हिदायत मिलती है कि मियाँ-बीवी को भी बेवजह एक-दूसरे के सामने बेपर्दा नहीं होना चाहिए।
शैतान ने यह दलील दी कि इस पेड़ की एक खासियत यह है कि जो इसका फल खाए, वह या तो फ़रिश्ता बन जाए या हमेशा के लिए ज़िंदा रहे।
ऐ आदम, जब तुम पैदा हुए, तब तुम्हारे अंदर इस फल को पचाने की क्षमता नहीं थी, इसलिए इसे खाना मना था, लेकिन अब जब वह क्षमता आ गई है, तो ये पाबंदी भी हट गई है।
इससे साबित होता है कि इस आयत में कोई विरोधाभास नहीं, और हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) ने कभी अल्लाह पर शक नहीं किया कि कोई भलाई उनसे ज़बरदस्ती रोकी जा रही है।
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