कुरान - 7:20 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

20
فَوَسۡوَسَ لَهُمَا ٱلشَّيۡطَٰنُ لِيُبۡدِيَ لَهُمَا مَا وُۥرِيَ عَنۡهُمَا مِن سَوۡءَٰتِهِمَا وَقَالَ مَا نَهَىٰكُمَا رَبُّكُمَا عَنۡ هَٰذِهِ ٱلشَّجَرَةِ إِلَّآ أَن تَكُونَا مَلَكَيۡنِ أَوۡ تَكُونَا مِنَ ٱلۡخَٰلِدِينَ

Transliteration: (Fawaswasa lahumash Shaitaanu liyubdiya lahumaa maa wooriya 'anhumaa min saw aatihimaa wa qaala maa nahaakumaa Rabbukumaa 'an haazihish shajarati illaaa an takoonaa malakaini aw takoonaa minal khaalideen)

फिर शैतान ने उन्हें फुसलाया, ताकि उनकी शर्मगाहें उन्हें ज़ाहिर कर दे जो उनसे छिपी हुई थीं [34], और उसने कहा: तुम्हारे रब ने तुम्हें इस पेड़ से सिर्फ़ इसलिए मना किया है कि कहीं तुम फ़रिश्ते न बन जाओ या हमेशा के लिए जीने वालों में से न हो जाओ [35]. (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 20 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आ'राफ़ – आयत 20 की तफ़्सीर

 

✅ [34] शैतान के बहकावे से कोई भी पूरी तरह महफूज़ नहीं

इससे हमें यह सीख मिलती है कि शैतान के वस्वसों से कोई भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं, न समय की पाबंदी है और न स्थान की। हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के सच्चे बंदे थे और जन्नत जैसे पाक और महफूज़ मक़ाम में थे, फिर भी शैतान उन्हें और बीबी हव्वा को बहकाने में कामयाब हो गया। इसलिए इंसान को गुनाह के स्थानों से बचना चाहिए और हर वक़्त अल्लाह की पनाह माँगते रहना चाहिए।
यहाँ से यह भी साबित होता है कि नबी पर वस्वसा आ सकता है, मगर वे गुनाह नहीं करते और न ही गलत अक़ीदे अपनाते हैं, इसलिए आयत में कोई विरोध नहीं।

✅ [35] उस वक़्त तक पर्दा था – शर्म महसूस नहीं हुई थी

यहाँ से मालूम होता है कि उस समय तक हज़रत आदम और बीबी हव्वा ने एक-दूसरे की शर्मगाह नहीं देखी थी। इससे यह हिदायत मिलती है कि मियाँ-बीवी को भी बेवजह एक-दूसरे के सामने बेपर्दा नहीं होना चाहिए।

✅ [36] शैतान की झूठी दलील और पेड़ का बहाना

शैतान ने यह दलील दी कि इस पेड़ की एक खासियत यह है कि जो इसका फल खाए, वह या तो फ़रिश्ता बन जाए या हमेशा के लिए ज़िंदा रहे।
ऐ आदम, जब तुम पैदा हुए, तब तुम्हारे अंदर इस फल को पचाने की क्षमता नहीं थी, इसलिए इसे खाना मना था, लेकिन अब जब वह क्षमता आ गई है, तो ये पाबंदी भी हट गई है।
इससे साबित होता है कि इस आयत में कोई विरोधाभास नहीं, और हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) ने कभी अल्लाह पर शक नहीं किया कि कोई भलाई उनसे ज़बरदस्ती रोकी जा रही है।

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