Transliteration: (Yaa Baneee Aadama qad anzalnaa 'alaikum libaasany yuwaaree saw aatikum wa reeshanw wa libaasut taqwaa zaalika khair; zaalika min Aayaatil laahi la'allahum yaz zakkaroon)
इससे मालूम होता है कि लिबास की तख़लीक़ खास तौर पर इंसानों के लिए हुई है। फ़रिश्तों और अल्लाह की दूसरी मख़लूक़ात इसके दायरे में नहीं आतीं।
अगर जिन्न लिबास पहनते हैं, तो वह इंसानों की नकल या असर की वजह से है।
यह भी वाज़ेह है कि शर्मगाह ढाँपने के लिए कपड़े पहनना वाजिब है, और ज़ीनत व खूबसूरती के लिए पहनना मुस्तहब व पसंदीदा है।
इससे मुराद यह है कि अल्लाह तआला ने इंसानों के लिए तीन तरह के लिबास नाज़िल किए हैं — दो जिस्मानी, एक रूहानी।
जिस्मानी लिबास में एक है जो शर्मगाह ढाँपने के लिए है, और दूसरा ज़ीनत व खूबसूरती के लिए — दोनों जायज़ और मुफ़ीद हैं।
रूहानी लिबास से मुराद है — ईमान, तक़्वा और नेक अमल।
ये तीनों लिबास आसमानी ही हैं:
ऊन, कपास और रेशम ज़मीन से उगते हैं मगर बारिश की बरकत से, जो आसमान से उतरती है।
तक़्वा भी वही वही का नतीजा है, जो अल्लाह के करम से आसमान से उतरती है।
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