कुरान - 2:100 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

100
أَوَكُلَّمَا عَٰهَدُواْ عَهۡدٗا نَّبَذَهُۥ فَرِيقٞ مِّنۡهُمۚ بَلۡ أَكۡثَرُهُمۡ لَا يُؤۡمِنُونَ

Transliteration: (Awa kullamaa 'aahadoo ahdan nabazahoo fareequm minhum; bal aksaruhum laa yu'minoon)

[100] क्या ऐसा नहीं है कि जब भी वे कोई वादा करते हैं, तो उनमें से एक गिरोह उसे फेंक देता है? बल्कि वास्तव में, उनमें से अधिकतर ईमान नहीं रखते। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 100 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

वादाख़िलाफ़ी और हक़ का इनकार

इस आयत में बनी इसराईल के बार-बार वादाख़िलाफ़ी की निंदा की जा रही है।

  • जब भी उन्होंने अल्लाह या उसके रसूलों से कोई अहद (वादा/संधि) किया,
  • तो उनमें से एक हिस्सा (गिरोह) उस वादे को तोड़ कर पीठ पीछे फेंक देता था,
    यानी उसे कोई अहमियत नहीं देता था।

यह वादा-तोड़ना सिर्फ़ कभी-कभार नहीं, बल्कि लगातार होता रहा,
और इसका असली कारण यह है कि —

"बल्कि वास्तव में, उनमें से अधिकतर ईमान नहीं रखते।"

यानी, यह वादाख़िलाफ़ी आचरण की ग़लती नहीं, बल्कि ईमान की कमी का नतीजा थी।

संदेश:

  • अल्लाह के साथ किया गया वादा बहुत बड़ा होता है।
  • जो लोग बार-बार वादे तोड़ते हैं, वे दरअसल ईमान में सच्चे नहीं होते।
  • एक सच्चे मोमिन की पहचान है कि वह अपने अहद को निभाता है, चाहे हालात जैसे भी हों।

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