कुरान - 2:98 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

98
مَن كَانَ عَدُوّٗا لِّلَّهِ وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ وَرُسُلِهِۦ وَجِبۡرِيلَ وَمِيكَىٰلَ فَإِنَّ ٱللَّهَ عَدُوّٞ لِّلۡكَٰفِرِينَ

Transliteration: (Man kaana 'aduwwal lillaahi wa malaaa'ikatihee wa Rusulihee wa Jibreela wa Meekaala fa innal laaha 'aduwwul lilkaafireen)

[98] जो कोई अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों और जिबरील [188] और मीकाईल का दुश्मन हो, तो निश्चित ही, अल्लाह भी काफ़िरों का दुश्मन है। [189] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 98 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[188] हज़रत जिबरील (अलैहिस्सलाम) की श्रेष्ठता

इस आयत से पता चलता है कि हज़रत जिबरील (अलैहिस्सलाम) को बहुत ऊँचा दर्जा हासिल है, क्योंकि उनका नाम सभी फ़रिश्तों में सबसे पहले लिया गया है।

  • जिबरील (अलैहिस्सलाम) वही (प्रकाशना) लाते हैं — जो इंसान की रूहानी ज़रूरत है।
  • मीकाईल (अलैहिस्सलाम) बारिश और रोज़ी लाते हैं — जो भौतिक जीवन के लिए ज़रूरी है।

इस क्रम से यह बात साफ़ होती है कि रूहानी मार्गदर्शन, भौतिक रोज़ी से श्रेष्ठ है, इसलिए जिबरील (अलैहिस्सलाम) को ऊँचा मुक़ाम मिला।

[189] अल्लाह के प्रिय बंदों से दुश्मनी — अल्लाह से दुश्मनी है

यह आयत यह सिखाती है कि अल्लाह के प्यारे रसूलों, फ़रिश्तों और नेक बंदों से मोहब्बत करना, दरअसल अल्लाह से मोहब्बत करना है।

  • और जो कोई इनसे दुश्मनी रखता है, वह अल्लाह की मर्ज़ी से टकराता है,
  • अल्लाह फ़रमाता है: “फिर मेरी पैरवी करो, अल्लाह तुम्हें मोहब्बत करेगा।” (आल-इमरान: 31)

इससे साबित होता है कि अल्लाह की मोहब्बत, उसके प्यारे बंदों की ताज़ीम और पैरवी से जुड़ी हुई है।

  • जो कोई जिबरील, मीकाईल या किसी भी रसूल का विरोध करता है, वह दरअसल अल्लाह की रहमत और हिदायत से इंकार कर रहा है।
  • एक फ़रिश्ते से दुश्मनी मानो सारे फ़रिश्तों से दुश्मनी है, जैसे एक नबी को झुठलाना सारे नबियों को झुठलाना है।

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