कुरान - 2:101 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

101
وَلَمَّا جَآءَهُمۡ رَسُولٞ مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٞ لِّمَا مَعَهُمۡ نَبَذَ فَرِيقٞ مِّنَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ كِتَٰبَ ٱللَّهِ وَرَآءَ ظُهُورِهِمۡ كَأَنَّهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa lammaa jaaa'ahum Rasoolum min 'indil laahi musaddiqul limaa ma'ahum nabaza fareequm minal lazeena ootul Kitaaba Kitaabal laahi waraaa'a zuhoorihim ka annahum laa ya'lamoon)

"और जब अल्लाह की तरफ़ से एक रसूल [191] उनके पास आया, जो उस चीज़ की तस्दीक़ करता था जो उनके पास थी, तो किताब वालों में से एक गिरोह [192] ने अल्लाह की किताब को अपनी पीठ के पीछे फेंक दिया [193] जैसे कि वो जानते ही न थे।" [194] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 101 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[191] अल्लाह के रसूल ﷺ की दिव्य (इलाही) हैसियत और मिशन

  • इस हिस्से में बताया गया है कि रसूल मुहम्मद ﷺ का आना एक इलाही हुक्म के तहत हुआ।
  • वो सिर्फ़ एक इंसानी लीडर नहीं थे, बल्कि अल्लाह के भेजे हुए पैग़म्बर थे।
  • उनकी ज़िम्मेदारी खुद अल्लाह ने ली — यह सिर्फ़ तारीखी घटना नहीं, बल्कि रहमत और मक़सद से भरा हुआ भेजा जाना था।

[192] किताब वालों (यहूद) के चार गिरोह

  • यहूद सब एक जैसे नहीं थे। उन्हें चार हिस्सों में बाँटा गया है:
    1. ईमान वाले – जिन्होंने तौरात को माना और फिर रसूल ﷺ पर भी ईमान लाया।
    2. खुल्ले नाफ़रमान – जिन्होंने तौरात को जानते हुए भी उसका इंकार किया।
      ("उनमें से एक गिरोह ने उसे फेंक दिया...")
    3. नासमझ गुनहगार – जो नादानी से अल्लाह की बातों को तोड़ते-मोड़ते थे।
      ("जैसे कि वो जानते ही न थे।")
    4. मुनाफ़िक़ – जो ज़ाहिर में तौरात को मानते थे, मगर अंदर से उसका मज़ाक उड़ाते और उसका विरोध करते थे।
      ("उनमें से ज़्यादातर ईमान नहीं लाते..." — अल-बक़रह: 100)

[193] क़ुरआन को छोड़ना = अल्लाह की किताब को पीठ पीछे डालना

  • इस आयत से सिखाया गया कि अगर कोई शख़्स सिर्फ़ तिलावत करे, या क़ुरआन को सजाए, मगर उस पर अमल न करे,
    तो वो ऐसा है जैसे क़ुरआन को पीठ के पीछे फेंक दिया गया हो।
  • यहूद ने भी ऐसा ही किया — रसूल ﷺ को उनकी किताबों में साफ़ तौर पर लिखा हुआ देखकर भी इंकार कर दिया।
  • ये महज़ नाफ़रमानी नहीं थी, बल्कि अल्लाह की किताब का अपमान था।

[194] बेबसी, मुनाफ़िक़त और असलियत की पोल

  • इस टुकड़े में एक नरमी से भरी चेतावनी है:
    कोई भी शख़्स जो इल्म रखता हो, मगर उस पर अमल न करे, वो अन्जान के बराबर है — या उससे भी बुरा।
  • क़ुरआन से मुंह मोड़ना, चाहे जिस्मानी हो या रूहानी, दोनों ही ग़ैर-एहतराम (disrespect) की निशानी हैं।
  • असल ईमान वही है जो सच्चे यक़ीन के साथ अमल में लाया जाए — सिर्फ़ नज़री इल्म (theoretical knowledge) काफ़ी नहीं।

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