कुरान - 2:150 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

150
وَمِنۡ حَيۡثُ خَرَجۡتَ فَوَلِّ وَجۡهَكَ شَطۡرَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِۚ وَحَيۡثُ مَا كُنتُمۡ فَوَلُّواْ وُجُوهَكُمۡ شَطۡرَهُۥ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَيۡكُمۡ حُجَّةٌ إِلَّا ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ مِنۡهُمۡ فَلَا تَخۡشَوۡهُمۡ وَٱخۡشَوۡنِي وَلِأُتِمَّ نِعۡمَتِي عَلَيۡكُمۡ وَلَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ

Transliteration: (Wa min haisu kharajta fawalli wajhaka shatral Masjidil Haraam; wa haisu maa kuntum fawalloo wujoohakum shatrahoo li'allaa yakoona linnaasi 'alaikum hujjatun illal lazeena zalamoo minhum falaa takhshawhum wakhshawnee wa liutimma ni'matee 'alaikum wa la'allakum tahtadoon)

150. और जहां से भी तुम (हे मुहम्मद) निकलो, अपने मुँह को पवित्र मस्जिद (काबा) की ओर कर लो [314]। और जहाँ भी तुम (ऐ मोमिनों) हो, अपने मुँह को उसकी ओर कर लो, ताकि लोगों के पास तुम्हारे खिलाफ कोई बहाना न रहे [315], सिवाय उन ज़ालिमों के [316]। इसलिए उनका न डरना बल्कि मुझसे ही डरना। ताकि मैं अपनी नेमत तुम्हारे ऊपर पूरी कर सकूँ और तुम सही मार्ग पर चल सको [317]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 150 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अल-बाक़रा – आयत 150 की व्याख्या
"और जहां से भी तुम (हे मुहम्मद) निकलो, अपने मुँह को पवित्र मस्जिद (काबा) की ओर कर लो। और जहाँ भी तुम (मोमिनों) हो, अपने मुँह को उसकी ओर कर लो, ताकि लोगों के पास तुम्हारे खिलाफ कोई बहाना न रहे, सिवाय उन ज़ालिमों के। इसलिए उनका न डरना बल्कि मुझसे ही डरना। ताकि मैं अपनी नेमत तुम्हारे ऊपर पूरी कर सकूँ और तुम सही मार्ग पर चल सको।"

✅ [314] काबा की तरफ मुख करने का समय, स्थान और सार्वभौमिकता

  • "जहां से भी तुम निकलो" के तीन आयाम समझे जा सकते हैं:
    1. समय आधारित: हे प्यारे नबी ﷺ, जब भी तुम कहीं निकलो (किसी भी समय), क़िबला की तरफ मुख करो। यह दर्शाता है कि क़िबला की ओर मुख करना किसी विशेष समय तक सीमित नहीं है, यह निरंतर और बाध्यकारी है।
    2. स्थान आधारित: पहली आयत मदीना के अंदर के स्थानों की ओर संकेत कर सकती है, जबकि यह आयत मदीना के बाहर के स्थानों, जैसे जंगल, रेगिस्तान या यात्रा के समय भी लागू होती है।
    3. दर्शक आधारित: पहली बात खास तौर पर नबी ﷺ के लिए थी, जबकि यह आयत पूरी मुस्लिम उम्मत को संबोधित करती है कि वे कहीं भी हों, काबा की तरफ मुख करें।
  • ये दृष्टिकोण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

✅ [315] मूर्तिपूजकों के बहस का अंत

  • इस आदेश से पहले मक्का के मूर्तिपूजक नबी ﷺ की इस दावे पर सवाल उठाते थे कि "मुहम्मद इब्राहीम (अ.स.) के धर्म पर हैं, फिर वे उसी काबा की ओर क्यों नहीं मुख करते जो इब्राहीम ने बनाया था?"
  • इस आयत से उनके बहाने निरस्त हो जाते हैं क्योंकि मुसलमान अब स्पष्ट रूप से काबा की तरफ मुख करते हैं।

✅ [316] अन्याय करने वालों के उपहास की अनदेखी

  • सत्य की स्पष्टता के बावजूद, कुछ ज़ालिम लोग हमेशा निंदा करेंगे।
  • ऐसे लोग निराधार ताने देंगे, जिनका कोई वज़न नहीं।
  • इस्लाम में, अपमान और ताने को नजरअंदाज कर सुन्नत पर कायम रहना जरूरी है।
  • नबी ﷺ ने बताया कि जो कोई भी भुला दी गई सुन्नत को फिर से जीवित करता है, उसे सौ शहीदों के बराबर सवाब मिलता है क्योंकि वह सताते हुए भी हक के रास्ते पर अडिग रहता है।

✅ [317] अल्लाह की नेमतों की पूरी प्राप्ति

  • क़िबला परिवर्तन, मदीना के लिए बोझ नहीं था, बल्कि मुसलमानों पर अल्लाह की नेमत का पूरा होना था।
  • पूर्व की उम्मतों के पास एक ही क़िबला था, जबकि इस उम्मत को दो क़िबले मिले:
    • पहली शुरुआत की दिशा (यरूशलेम)
    • अंतिम और स्थायी क़िबला (काबा)
  • यह इब्राहीम (अ.स.) के साथ नबी ﷺ के संबंध और भविष्यवाणी को पूरा करता है।
  • इसलिए, क़िबला परिवर्तन भ्रम नहीं, बल्कि अल्लाह की हिदायत और रहमत है।

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