कुरान - 2:180 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

180
كُتِبَ عَلَيۡكُمۡ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ ٱلۡمَوۡتُ إِن تَرَكَ خَيۡرًا ٱلۡوَصِيَّةُ لِلۡوَٰلِدَيۡنِ وَٱلۡأَقۡرَبِينَ بِٱلۡمَعۡرُوفِۖ حَقًّا عَلَى ٱلۡمُتَّقِينَ

Transliteration: (Kutiba 'alaikum izaa hadara ahadakumul mawtu in taraka khairanil wasiyyatu lilwaalidaini wal aqrabeena bilma'roofi haqqan 'alalmut taqeen)

180. आप पर यह फ़रज़ किया गया है कि जब आप में से किसी की मौत नज़दीक आ जाए और वह संपत्ति (पैसा-दौलत) छोड़ जाए, तो वह माता-पिता और नज़दीकी रिश्तेदारों के लिए अपनी वसीयत बनाए, जैसा कि उस समय की रिवायतें हैं। यह अल्लाह से डरने वालों के लिए ज़रूरी है। [393] [394] [395] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 180 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

✅ [393] वसीयत करने का फ़रज़:
इस्लाम के आने से पहले, जब वारिसों के क़ानून नहीं थे, तब मौत के वक्त वसीयत करना ज़रूरी था। वसीयत से यह तय होता था कि व्यक्ति की संपत्ति उसकी मौत के बाद कैसे बाँटी जाएगी।
वसीयत की ज़रूरत खत्म होना:
जब इस्लामी वारिस के क़ानून आए तो वारिसों के लिए वसीयत की जरूरत ख़त्म हो गई। कुरआन ने साफ़ तौर पर वारिसों के लिए संपत्ति के हिस्से तय कर दिए। इसलिए अब वसीयत बनाना ज़रूरी नहीं रहा।

✅ [394] संपत्ति की परिभाषा:
इस आयत में "संपत्ति" से मतलब है व्यक्ति की अपनी दौलत। यह किसी और की संपत्ति पर लागू नहीं होती। वसीयत उसी दौलत के लिए होनी चाहिए जो मौत के वक्त उसके पास हो।

✅ [395] अल्लाह से डरना और वसीयत:
यह फ़रज़ सिर्फ उन लोगों के लिए था जो अल्लाह से डरते हैं। वारिस कानून आने के बाद, वारिसों के लिए वसीयत बनाना जरूरी नहीं रहा क्योंकि कुरआन ने वसीयत के बिना ही संपत्ति के बंटवारे का तरीका बता दिया। लेकिन इंसान अपनी दौलत का कुछ हिस्सा उपहार, दान या ज़कात के लिए वसीयत कर सकता है।

आयत का अब्रजेशन (रद्द होना):
यह समझा जाता है कि कुरआनी आयत को हदीस द्वारा रद्द (अबरज) किया जा सकता है। इस मामले में, हदीस ने कहा है: "वारिस के लिए वसीयत की जरूरत नहीं।"

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