कुरान - 2:178 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

178
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلۡقِصَاصُ فِي ٱلۡقَتۡلَىۖ ٱلۡحُرُّ بِٱلۡحُرِّ وَٱلۡعَبۡدُ بِٱلۡعَبۡدِ وَٱلۡأُنثَىٰ بِٱلۡأُنثَىٰۚ فَمَنۡ عُفِيَ لَهُۥ مِنۡ أَخِيهِ شَيۡءٞ فَٱتِّبَاعُۢ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَأَدَآءٌ إِلَيۡهِ بِإِحۡسَٰنٖۗ ذَٰلِكَ تَخۡفِيفٞ مِّن رَّبِّكُمۡ وَرَحۡمَةٞۗ فَمَنِ ٱعۡتَدَىٰ بَعۡدَ ذَٰلِكَ فَلَهُۥ عَذَابٌ أَلِيمٞ

Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanoo kutiba alaikumul qisaasu fil qatlaa alhurru bilhurri wal'abdu bil'abdi wal unsaa bil unsaa; faman 'ufiya lahoo min akheehi shai'un fattibaa'um bilma'roofi wa adaaa'un ilaihi bi ihsaan; zaalika takhfeefum mir rabikum wa rahmah; famani' tadaa ba'da zaalika falahoo 'azaabun aleem)

178. ऐ ईमान वालो! तुम्हारे ऊपर क़िसास (क़ानूनी बदला) फ़र्ज़ किया गया है [387] कत्ल के मामले में: आज़ाद के बदले आज़ाद, ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम, और औरत के बदले औरत [388]। फिर जिसको उसके भाई की तरफ़ से कुछ माफ़ कर दिया जाए [389], तो भले तरीक़े से (दिया जाना चाहिए) और अच्छे ढंग से अदायगी की जाए। यह तुम्हारे रब की तरफ़ से एक रियायत और रहमत है [390]। फिर जो इसके बाद ज़्यादती करे [391], तो उसके लिए दर्दनाक अज़ाब है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 178 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

✅ [387] क़िसास का हुक्म और उसका लागू होना

  • इस आयत में अल्लाह ने इंसाफ़ के लिए क़िसास (बदला) को फ़र्ज़ किया, जिससे समाज में बराबरी और न्याय का निज़ाम क़ायम होता है।
  • आज़ाद के लिए आज़ाद, ग़ुलाम के लिए ग़ुलाम, और औरत के लिए औरत—ये नियम सामाजिक दर्जे के हिसाब से न्याय का तआद्दुल बताते हैं।
  • पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ इस क़ानून में शामिल नहीं हैं क्योंकि उनके लिए अल्लाह ने खास आदाब और मरतबा रखा है (सूरह अल-हुजरात 49:1-2)।

✅ [388] क़ातिल के लिए सज़ा का हुक्म

  • यह हुक्म इस्लामी इंसाफ़ का वहूल सिद्धांत है कि क़ातिल, चाहे औरत हो या मर्द, ग़ुलाम हो या आज़ाद, सबके लिए सज़ा बराबर है।
  • किसी ज़िम्मी (इस्लामी हिफ़ाज़त में रहने वाले गैर-मुस्लिम) की जान लेना भी उतना ही संगीन जुर्म है जितना किसी मुसलमान का क़त्ल करना।
  • जिहाद या जंग के हालात को छोड़कर बाक़ी तमाम हालात में जान का बदला जान ही है।

✅ [389] माफ़ी और मुआवज़ा (दीयत)

  • अगर मारे गए शख़्स के रिश्तेदार क़ातिल को माफ़ कर दें, तो फिर मुआवज़ा लिया जा सकता है।
  • यह दीयत इस्लाम में रहमत की मिसाल है, जिससे इंतकाम की भावना को रोका जा सकता है और सुलह को बढ़ावा मिलता है।
  • कुछ हालात में, जैसे बाप द्वारा बेटे को मार देना, वहाँ क़िसास लागू नहीं होता।

✅ [390] माफ़ी में अल्लाह की रहमत

  • यह माफ़ी अल्लाह की तरफ़ से एक बड़ी रहमत और रियायत है।
  • मुआवज़ा अच्छे अख़लाक़ के साथ दिया जाना चाहिए, ताकी पीड़ित परिवार को इज़्ज़त और तसल्ली मिले।
  • यह समाज को राहत, और इंसान को इंसाफ़ व सुकून देने की अल्लाह की हिकमत है।

✅ [391] हद से बढ़ जाना (ज़्यादती करना)

  • जो इंसाफ़ के दायरे से बाहर जाकर ज़्यादती करे—जैसे क़ातिल को सज़ा देने में यातना देना या उसका अंग-भंग करना—वो इस्लाम में हराम है।
  • सज़ा जुर्म के बराबर होनी चाहिए, ना उससे ज़्यादा।

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