कुरान - 2:183 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

183
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ

Transliteration: (Yaa ayyuhal lazeena aamanoo kutiba 'alaikumus Siyaamu kamaa kutiba 'alal lazeena min qablikum la'allakum tattaqoon)

183. ऐ ईमान लाने वालों! रोज़ा (उपवास) [398] तुम पर फर्ज़ किया गया है [399] जैसे तुमसे पहले लोगों पर फर्ज़ किया गया था, ताकि तुम परहेज़गार (अल्लाह से डरने वाले) बन जाओ। [400] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 183 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[398] रमज़ान के रोज़े — फ़र्ज़ इबादत

रोज़ा रखने की अनिवार्यता:
इस आयत में जो "रोज़ा" बताया गया है वह रमज़ान के महीने का फर्ज़ रोज़ा है।
शुरू में रोज़ा सिर्फ़ 10 मुहर्रम (आशूरा) का फर्ज़ किया गया था, फिर यह 13, 14 और 15 तारीख़ों तक बढ़ाया गया। बाद में रमज़ान के रोज़ों को फर्ज़ किया गया और वह पहले के रोज़ों को रद्द (मंसूख) कर गया।
रमज़ान के रोज़े हिजरत के दूसरे साल फर्ज़ हुए।

[399] ग़ैर-मुस्लिमों पर इबादत का लागू न होना

ग़ैर-मुस्लिमों के लिए रोज़ा फर्ज़ नहीं:
यह आयत यह भी साफ़ करती है कि ग़ैर-मुसलमानों पर इस्लामी इबादतें लागू नहीं होतीं जब तक वे इस्लाम क़ुबूल न करें।
और जब कोई इस्लाम अपनाता है, तो उसे अपने ग़ैर-इस्लामी दौर की इबादतों की क़ज़ा (पूर्ति) नहीं करनी होती।

[400] रोज़े का मक़सद — परहेज़गारी

इतिहासिक दृष्टिकोण:
रोज़ा कोई नया हुक्म नहीं है। यह पिछले नबियों की उम्मतों पर भी फर्ज़ था — यह एक पुरानी इबादत है।

परहेज़गारी की राह:
रोज़ा नफ़्स-ए-अम्मारा (नीच इच्छाओं) को कंट्रोल करने का ज़रिया है।
इंसान खाने-पीने, ग़ुस्सा, ग़ीबत, नफ़रत जैसी चीज़ों से बचता है और रूहानी तरक़्क़ी (spiritual growth) की तरफ़ बढ़ता है।

अल्लाह से क़ुर्ब हासिल करना:
रोज़ा केवल भूखा रहने का नाम नहीं, बल्कि गुनाहों से बचकर अल्लाह की रज़ा (ख़ुशी) हासिल करने का ज़रिया है।
आयत में जो "ताकि तुम परहेज़गार बनो" कहा गया है — इसका मतलब यह है कि परहेज़गारी की उम्मीद की जाती है, गारंटी नहीं — यह इंसान की कोशिश और नियत पर निर्भर है।

सारांश:
रोज़ा मुसलमानों पर एक अहम फ़र्ज़ है, जो सिर्फ़ भूखा रहने के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक सुधार, गुनाहों से दूरी, और अल्लाह की क़ुर्ब पाने के लिए है। यह परहेज़गारी और खुद पर क़ाबू पाने की ट्रेनिंग है, जिससे इंसान अल्लाह के ज़्यादा क़रीब हो सकता है।

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