Transliteration: (Ayyaamam ma'doodaat; faman kaana minkum mareedan aw'alaa safarin fa'iddatum min ayyaamin ukhar; wa 'alal lazeena yuteeqoonahoo fidyatun ta'aamu miskeenin faman tatawwa'a khairan fahuwa khairul lahoo wa an tasoomoo khairul lakum in kuntum ta'lamoon)
रोज़ों की गिनती:
रोज़े पूरे साल नहीं, बल्कि सिर्फ़ 29 या 30 दिन रमज़ान के होते हैं। यह कोई भारी बोझ नहीं है बल्कि एक अस्थायी (थोड़े समय की) इबादत है।
अल्लाह, जो पूरे साल हमें रिज़्क़ देता है, वह हमसे सिर्फ़ एक महीने के लिए भूख-प्यास से रुकने का हुक्म देता है।
बीमार लोगों के लिए रियायत:
अगर रोज़ा रखने से इंसान की तबीयत बिगड़ सकती है, तो वह रोज़ा छोड़ सकता है।
लेकिन अगर रोज़ा उसकी सेहत के लिए ठीक है, तो उसे रखने चाहिए।
सफ़र में रोज़ा छोड़ने की इजाज़त:
अगर कोई सफ़र पर है — और शरई हिसाब से सफ़र कम से कम 92 किलोमीटर (57 मील) हो और 15 दिन से कम रुकने का इरादा हो — तो रोज़ा न रखे और बाद में पूरा करे।
छूटे हुए रोज़ों की भरपाई (क़ज़ा):
बीमार या मुसाफ़िर व्यक्ति को रोज़ा छोड़ने की इजाज़त है, लेकिन वह बाद में उतने ही दिनों के रोज़े रखे।
हदीस के अनुसार, सफर में नमाज़ भी क़सर (छोटी) की जाती है।
कमज़ोर और बूढ़े लोग:
जिन्हें रोज़ा रखने की ताक़त नहीं है — जैसे बूढ़े लोग या लाइलाज मरीज़ — उन्हें रोज़ा माफ़ है।
लेकिन बदले में कुछ देना होगा।
एक मिस्कीन को खाना:
ऐसे लोग हर छोड़े गए रोज़े के बदले एक गरीब को खाना खिलाएं या ढाई किलो गेहूं (फित्रा के बराबर) दें।
अगर चाहें तो इससे ज़्यादा भी दे सकते हैं।
अल्लाह के लिए ज़्यादा देना:
अगर कोई सिर्फ़ ज़रूरत भर नहीं, बल्कि उससे ज़्यादा भलाई करता है (जैसे ज़्यादा गरीबों को खाना देना), तो यह उसके लिए और बेहतर है।
यह ऐच्छिक (वॉलंटरी) भलाई मानी जाती है और अल्लाह इसे पसंद करता है।
रोज़ा ज़्यादा सवाब वाला है:
हालाँकि बीमारी या सफ़र में छुट है, लेकिन अगर इंसान रख सकता है, तो रोज़ा रखना ज़्यादा सवाब (अच्छा फल) देने वाला है।
फ़िदया देना इजाज़त है, लेकिन रोज़े का दर्जा उससे ऊँचा है।
सारांश:
यह आयत रोज़ों के बारे में रियायतों को बताती है — बीमार, मुसाफ़िर और कमज़ोर लोगों को छूट है, लेकिन फिर भी रोज़ा रखना बेहतर है।
इस आयत से हमें समझ आता है कि इस्लाम में राहत भी है और भलाई की हिम्मत भी।
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