कुरान - 2:185 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

185
شَهۡرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِيٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلۡقُرۡءَانُ هُدٗى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٖ مِّنَ ٱلۡهُدَىٰ وَٱلۡفُرۡقَانِۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهۡرَ فَلۡيَصُمۡهُۖ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوۡ عَلَىٰ سَفَرٖ فَعِدَّةٞ مِّنۡ أَيَّامٍ أُخَرَۗ يُرِيدُ ٱللَّهُ بِكُمُ ٱلۡيُسۡرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ ٱلۡعُسۡرَ وَلِتُكۡمِلُواْ ٱلۡعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُواْ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَىٰكُمۡ وَلَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ

Transliteration: (Shahru Ramadaanallazeee unzila feehil Qur'aanu hudal linnaasi wa baiyinaatim minal hudaa wal furqaan; faman shahida minkumush shahra falyasumhu wa man kaana mareedan aw 'alaa safarin fa'iddatum min ayyaamin ukhar; yureedul laahu bikumul yusra wa laa yureedu bikumul 'usra wa litukmilul 'iddata wa litukabbirul laaha 'alaa maa hadaakum wa la'allakum tashkuroon)

185. रमज़ान का महीना [409] वह है जिसमें कुरआन नाज़िल (उतारा) किया गया [410], जो लोगों के लिए हिदायत है और जिसमें हिदायत की खुली निशानियाँ हैं और हक़-बात को ग़लत-बात से अलग करने वाला है [411]। तो तुममें से जो कोई यह महीना पाए, वह इस महीने के रोज़े रखे [412]। और जो बीमार हो या सफर में हो, तो वह दूसरे दिनों में रोज़े पूरे करे [413]। अल्लाह तुम्हारे लिए आसानी चाहता है और तुम्हारे लिए मुश्किल नहीं चाहता। (वह चाहता है) कि तुम गिनती पूरी करो [414] और अल्लाह की बड़ाई करो, जिस तरह उसने तुम्हें हिदायत दी, ताकि तुम उसका शुक़्र अदा करो [415]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 185 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[409] रमज़ान का मुक़द्दस महीना

रमज़ान की अहमियत:
यह वही महीना है जिसमें कुरआन नाज़िल किया गया, इसलिए इस महीने को खास दर्जा मिला है।
पूरा साल में सिर्फ़ रमज़ान का ज़िक्र कुरआन में नाम लेकर आया है, जो इसकी फज़ीलत (महानता) को दिखाता है।

[410] कुरआन का नाज़िल होना

लौह-ए-महफ़ूज़ से आसमान-ए-दुनिया तक:
कुरआन रमज़ान में लौह-ए-महफ़ूज़ (एक महफूज़ इलाही किताब) से आसमान-ए-दुनिया पर उतारा गया, फिर वहां से 23 सालों में धीरे-धीरे नबी करीम ﷺ पर नाज़िल हुआ।
इसलिए रमज़ान को बरकत वाला महीना माना गया है।

[411] कुरआन — हिदायत और फ़ुर्क़ान

कुरआन की पहचान:
कुरआन को हिदायत, और फुर्क़ान (सही और ग़लत में फर्क करने वाला) कहा गया है।
यह इंसानों के लिए ज़िंदगी का सीधा रास्ता बताता है, और यह बताता है कि क्या हलाल है और क्या हराम।

[412] रमज़ान में रोज़ा रखना

रोज़े का फ़र्ज़ होना:
जो भी मुसलमान रमज़ान का चाँद देखे, उस पर रोज़ा रखना फ़र्ज़ (ज़रूरी) है।
अगर कोई इंसान पूरे रमज़ान में बेहोश रहा, तो उस पर रोज़ा फ़र्ज़ नहीं। लेकिन अगर एक भी होश में दिन मिला, तो सारे रोज़े फ़र्ज़ हो जाते हैं।

[413] छूटे रोज़ों की क़ज़ा

बीमार या मुसाफ़िर के लिए रियायत:
अगर कोई बीमार या सफर में है और रोज़ा नहीं रख सकता, तो वह बाद में उतने ही रोज़े दूसरे दिनों में रखे।
इससे इस्लाम की लचक (flexibility) और रहमत ज़ाहिर होती है।

[414] रोज़ों की गिनती पूरी करना

29 या 30 दिन पूरे करना:
इस आयत में हुक्म है कि रोज़े की मुकम्मल गिनती (29 या 30) पूरी करो।
रमज़ान की शुरुआत और ख़त्म होने का सही तरीका चाँद देखकर तय किया जाता है — न कि सिर्फ़ कैलेंडर या खबरो पर भरोसा करके।

[415] अल्लाह का शुक्र और ईद की ख़ुशी

शुक्र और अल्लाह की बड़ाई:
रमज़ान का मक़सद सिर्फ़ भूखा रहना नहीं, बल्कि हिदायत पाना और अल्लाह का शुक्र अदा करना है।
ईद की नमाज़, तकबीरें (अल्लाहु अकबर कहना), और खुशी — सब इस बात की निशानी हैं कि हम रमज़ान की बरकतों पर अल्लाह का शुक्र मना रहे हैं।

🔚 सारांश:

यह आयत रमज़ान की फज़ीलत, कुरआन की नाज़िलत, रोज़े की फ़र्ज़ियत, और इस महीने की रहमत, आसानियाँ और शुक्रगुज़ारी के बारे में पूरी रहनुमाई देती है।
इससे हमें समझ आता है कि रमज़ान सिर्फ़ भूखा रहने का नाम नहीं, बल्कि यह अल्लाह से करीब होने का महीना है — कुरआन पढ़ने, गुनाहों से बचने और नेकी में आगे बढ़ने का महीना।

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