Transliteration: (Kutiba alaikumulqitaalu wa huwa kurhullakum wa 'asaaa an takrahoo shai'anw wa huwa khairullakum wa 'asaaa an tuhibbo shai'anw wa huwa sharrullakum; wallaahu ya'lamu wa antum laa ta'lamoon)
✅ [505] जब शर्तें पूरी हों तो जिहाद फर्ज़ बन जाता है
इस आयत में "नापसंद" शब्द से तात्पर्य है इंसानी स्वाभाविक हिचकिचाहट या झिझक, न कि उन नेक सहाबियों की नापसंदगी जो कभी भी अल्लाह के फरमान का विरोध नहीं करते थे।
🔹 अल्लाह के आदेश का विरोध करना ईशनाकी और disbelief (कुफ़्र) है।
🔹 जिहाद (अल्लाह की राह में लड़ाई) दो प्रकार का हो सकता है:
✅ [506] अपनी इच्छाओं से ऊपर अल्लाह की حکمت पर भरोसा करो
यह आयत सिखाती है कि इंसान कभी-कभी ऐसी चीज़ें नापसंद करता है जो उसके लिए फायदेमंद होती हैं, या ऐसी चीज़ों की इच्छा करता है जो उसके लिए हानिकारक होती हैं, क्योंकि उसकी समझ सीमित होती है।
🔹 उदाहरण के तौर पर, एक मरीज मीठी दवा मांग सकता है, लेकिन डॉक्टर उसे कड़वी पर असरदार दवा देता है।
🔹 इसी तरह, अनसुनी दुआएं या मुश्किलें हमें निराश नहीं करना चाहिए — अल्लाह अपने बंदों के लिए जो भलाई जानता है, वही बेहतर होता है।
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