Transliteration: (Wa laa taj'alul laaha 'urdatal li aymaanikum an tabarroo wa tattaqoo wa tuslihoo bainan naas; wallaahu Samee'un 'Aleem)
यह आयत उस समय उतरी थी जब हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा (र.अ.) ने अपने बहनोई हज़रत नु'मान बिन बशीर (र.अ.) से न बात करने, न मिलने और उनके विवाद को सुलझाने की क़स्म खाई थी।
🔹 इस आयत से दो महत्वपूर्ण बातें निकलती हैं:
इस आयत से कुछ फैसले (हुक्म) निकलते हैं:
🔹 अधिक क़स्में खाने से बचना चाहिए, क्योंकि यह किसी के रिज्क (रोज़ी) पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं।
🔹 क़स्मों का प्रयोग कभी भी पापपूर्ण कार्यों को जायज़ ठहराने के लिए नहीं करना चाहिए या अच्छे कार्यों से बचने के लिए नहीं करना चाहिए, जैसे कहना: "मैं नमाज़ नहीं पढ़ूंगा क्योंकि मैंने क़स्म खाई है कि नहीं पढ़ूंगा।"
🔹 मुसलमानों के बीच सुलह करना सबसे उच्च प्रकार की पूजा (इबादत) में से है, जबकि बंटवारा करना सबसे बड़े पापों में से एक है।
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