कुरान - 2:225 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

225
لَّا يُؤَاخِذُكُمُ ٱللَّهُ بِٱللَّغۡوِ فِيٓ أَيۡمَٰنِكُمۡ وَلَٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا كَسَبَتۡ قُلُوبُكُمۡۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٞ

Transliteration: (Laa yu'aakhi zukumul laahu billaghwi feee aymaa nikum wa laakiny yu'aakhi zukum bimaa kasabat quloo bukum; wallaahu Ghafoorun Haleem)

225. अल्लाह तुमसे उन क़स्मों (सपनों) के बारे में हिसाब नहीं लेता जो अनजाने में की जाती हैं [535]। हाँ, वह तुमसे उन क़स्मों का हिसाब लेता है जो तुम्हारे दिलों की नीयत से की जाती हैं [536]। और यकीनन, अल्लाह सबसे ज़्यादा माफ़ करने वाला, सबसे ज्यादा सहनशील है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 225 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[535] अनजाने में की गई क़स्मों पर कोई ग़लती नहीं

इस आयत से यह स्पष्ट होता है कि अल्लाह उन क़स्मों का हिसाब नहीं लेता, जो अनजाने में की जाती हैं। अगर किसी ने गलती से क़स्म खा ली हो, जैसे कि किसी घटना के बारे में झूठी क़स्म खा लेना, तो इसके लिए कोई ग़लती नहीं मानी जाती। यह क़स्म "क़स्मे लगव" कहलाती है।

  • उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति ने बिना किसी मंशा के किसी बात पर क़स्म खा ली, तो इस पर कोई पाप नहीं होगा।
  • लेकिन अगर क़स्म जानबूझकर और सच्चाई से परे खाई जाती है, तो यह "क़स्मे ग़मोस" कहलाती है और यह एक गंभीर पाप माना जाता है।

[536] जानबूझकर झूठी क़स्मों पर हिसाब

अल्लाह उन क़स्मों का हिसाब लेता है जो जानबूझकर और दिल से की जाती हैं। इसका मतलब है कि यदि किसी ने सच मानकर झूठी क़स्म खा ली, तो वह "क़स्मे मुन्क़िदा" कहलाती है। ऐसे में यह क़स्म तो झूठी मानी जाती है और इस पर ग़लती होगी।

  • हनफ़ी मसलक के अनुसार, यदि किसी ने कुछ ऐसा कहा जिसे बाद में वह गलत समझे तो उसे अनजाने में की गई क़स्म माना जाएगा।
  • इमाम शाफ़ी (रह.) के अनुसार, आम तौर पर वाक्य जैसे "ख़ुदा की क़स्म, आओ" या "ख़ुदा की क़स्म, बैठ जाओ" बिना मंशा के होते हैं और इनको "क़स्मे लगव" माना जाता है।

तफ़सीर:
यह आयत हमें यह सिखाती है कि अल्लाह ने हमारे दिलों के इरादों को देखा है, और अनजाने में की गई क़स्मों के लिए हमें जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता। हालांकि, यदि किसी ने जानबूझकर क़स्म खाई और यह झूठी निकली, तो यह एक पाप है और इसके लिए हिसाब लिया जाएगा। इस आयत में अल्लाह की माफ़ी और सहनशीलता का ज़िक्र भी है, जो यह बताता है कि यदि हम सच्चे दिल से तौबा करते हैं, तो अल्लाह हमें माफ़ कर देता है।

सारांश:
इस आयत में यह बताया गया है कि अल्लाह अनजाने में की गई क़स्मों पर कोई हिसाब नहीं लेता, लेकिन जानबूझकर की गई क़स्मों का हिसाब लिया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि हम सच बोलें और अपनी क़स्मों को बिना किसी गलत इरादे के न लें।

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