कुरान - 2:227 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

227
وَإِنۡ عَزَمُواْ ٱلطَّلَٰقَ فَإِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٞ

Transliteration: (Wa in 'azamut talaaqa fa innal laaha Samee'un 'Aleem)

227. और अगर वे तलाक़ देने का दृढ़ निर्णय ले लें [539], तो यकीनन, अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 227 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[539] 'इला' की अवधि के बाद तलाक़ का अंतिम निर्णय

यदि 'इला' की चार महीने की अवधि के बाद पति तलाक़ देने का दृढ़ निर्णय लेता है, तो वह इसे लागू कर सकता है।

  • यह आयत बताती है कि अल्लाह उस फैसले और नीयत को जानता है जो दिल में है।
  • तलाक़ एक गंभीर निर्णय है, और इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। क़ुरआन हमें यह याद दिलाता है कि अल्लाह सुनता है और जानता है, चाहे जो भी निर्णय दिल में हो।

मूल विचार:

  • तलाक़ का निर्णय केवल अल्लाह के सामने लिया जा सकता है, और उस समय का हर फैसला अल्लाह की जानकारी में होता है।
  • तलाक़ का निर्णय अल्फ़ाज़ के साथ होना चाहिए, और इस फैसले का अल्हदा परिणाम होता है, जो पति-पत्नी के रिश्ते को प्रभावित करता है।

तफ़सीर (स्पष्टीकरण)

यह आयत तलाक़ के फैसले को बहुत गंभीरता से लेने का संदेश देती है। तलाक़ एक कठिन निर्णय है जो न केवल पति और पत्नी के रिश्ते को समाप्त करता है, बल्कि समाज और परिवार पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

  • तलाक़ का फैसला केवल दिल से नहीं, बल्कि पूरी तरह सोच-समझकर लिया जाना चाहिए, और अल्लाह को सच्चाई से सूचित किया जाना चाहिए।
  • अल्हदा फैसला लेने से पहले यह जरूरी है कि व्यक्ति सही और न्यायसंगत तरीके से सोचे, और अल्लाह से मार्गदर्शन और माफी की प्रार्थना करे।

सारांश:
यह आयत तलाक़ के फैसले में दृढ़ता की बात करती है, और यह बताती है कि अल्लाह हमारी नीयत और फैसलों को जानता है। तलाक़ एक गंभीर मामला है, और यह संदेश देती है कि इस फैसले को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now