Transliteration: (Wa in tallaqtumoohunna min qabli an tamassoohunna wa qad farad tum lahunna fareedatan fanisfu maa faradtum illaaa ai ya'foona aw ya'fuwallazee biyadihee 'uqdatunnikaah; wa an ta'fooo aqrabu littaqwaa; wa laa tansawulfadla bainakum; innal laaha bimaa ta'maloona Baseer)
"और अगर तुम उन्हें तलाक दे दो इससे पहले कि तुमने उनसे शारीरिक संबंध बनाए हों [584], लेकिन तुमने उनका महर तय किया हो, तो जो महर तय किया था, उसका आधा उन्हें देना पड़ेगा। सिवाय इसके कि पत्नी माफ़ करने का फैसला करें [585] या वह व्यक्ति जो विवाह का बंधन रखे, ज़्यादा दे [586]। और अगर तुम ज़्यादा दोगे तो यह अधिक धार्मिकता के करीब है [587]। और आपस में अच्छे तरीके से पेश आना न भूलें [588]। निश्चय ही, अल्लाह को तुम जो करते हो, उसकी पूरी जानकारी है।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)
इस आयत से हमें यह सिखने को मिलता है कि तलाक में केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से भी निर्णय लेने की जरूरत होती है। पति और पत्नी दोनों के बीच सम्मान और समझ का होना इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार एक सच्चे और पवित्र तलाक का संकेत है।
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