कुरान - 2:237 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

237
وَإِن طَلَّقۡتُمُوهُنَّ مِن قَبۡلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ وَقَدۡ فَرَضۡتُمۡ لَهُنَّ فَرِيضَةٗ فَنِصۡفُ مَا فَرَضۡتُمۡ إِلَّآ أَن يَعۡفُونَ أَوۡ يَعۡفُوَاْ ٱلَّذِي بِيَدِهِۦ عُقۡدَةُ ٱلنِّكَاحِۚ وَأَن تَعۡفُوٓاْ أَقۡرَبُ لِلتَّقۡوَىٰۚ وَلَا تَنسَوُاْ ٱلۡفَضۡلَ بَيۡنَكُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِيرٌ

Transliteration: (Wa in tallaqtumoohunna min qabli an tamassoohunna wa qad farad tum lahunna fareedatan fanisfu maa faradtum illaaa ai ya'foona aw ya'fuwallazee biyadihee 'uqdatunnikaah; wa an ta'fooo aqrabu littaqwaa; wa laa tansawulfadla bainakum; innal laaha bimaa ta'maloona Baseer)

237:

"और अगर तुम उन्हें तलाक दे दो इससे पहले कि तुमने उनसे शारीरिक संबंध बनाए हों [584], लेकिन तुमने उनका महर तय किया हो, तो जो महर तय किया था, उसका आधा उन्हें देना पड़ेगा। सिवाय इसके कि पत्नी माफ़ करने का फैसला करें [585] या वह व्यक्ति जो विवाह का बंधन रखे, ज़्यादा दे [586]। और अगर तुम ज़्यादा दोगे तो यह अधिक धार्मिकता के करीब है [587]। और आपस में अच्छे तरीके से पेश आना न भूलें [588]। निश्चय ही, अल्लाह को तुम जो करते हो, उसकी पूरी जानकारी है।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 237 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[584] तलाक के बाद आधे महर का निर्धारण

  • इस आयत में कहा गया है कि यदि तलाक शारीरिक संबंध बनाने से पहले हो और महर तय किया गया हो, तो पत्नी को महर का आधा हिस्सा दिया जाएगा।
  • यह नियम केवल तब लागू होता है जब तलाक से पहले कोई शारीरिक संबंध नहीं हुए हों। यदि पति की मृत्यु तलाक से पहले हो, तो पत्नी को पूरा महर देना होता है।

[585] क्षमा का विकल्प

  • यहाँ पर दो प्रकार के विकल्प दिए गए हैं। पहली स्थिति में पत्नी आधे महर या उससे भी कम को स्वीकार करने का निर्णय ले सकती है। यह निर्णय पत्नी की दया और सहानुभूति को दर्शाता है।
  • दूसरी स्थिति में पति अधिक महर देने का विकल्प चुन सकता है, भले ही महर का आधा ही देना आवश्यक हो। यह एक आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टिकोण है, जो रिश्ते में सम्मान और समझ को बढ़ावा देता है।

[586] विवाह बंधन का अधिकार पति के पास

  • इस आयत में यह स्पष्ट किया गया है कि विवाह बंधन पति के हाथ में होता है। वह ही विवाह को खत्म करने का अधिकार रखता है।
  • खुला (पत्नी द्वारा तलाक के लिए मुआवजा देना) की स्थिति में भी, भले ही पत्नी मुआवजा दे, तलाक के लिए पति की स्वीकृति जरूरी होती है। यह इस्लामी क़ानून के तहत एक महत्वपूर्ण पहलू है।

[587] तलाक के समय अधिक देने का महत्व

  • यदि पति आधे महर से अधिक देता है, तो यह पवित्रता और धार्मिकता का संकेत माना जाता है। तलाक के समय इस अतिरिक्त राशि का देना पति की नैतिकता और धार्मिक श्रेष्ठता को दर्शाता है।
  • इस्लाम में, पति को रिश्ते का नेता माना जाता है और एक अच्छे नेता के लिए यह अधिक सम्मानजनक है कि वह दयालुता से अधिक दे न कि कम या बेमन से।

[588] तलाक के बाद आपसी सम्मान बनाए रखना

  • आयत में तलाक के बाद दोनों पक्षों को सम्मानपूर्वक और शालीनता से पेश आने की सलाह दी गई है। तलाक के बावजूद, दोनों को एक-दूसरे के प्रति इज्जत और आदर बनाए रखना चाहिए।
  • तलाक के बाद कोई भी ईर्ष्या, गुस्सा, या नफरत नहीं होनी चाहिए। पूर्व जोड़ीदारों के बीच इस्लामी आचार-व्यवहार का पालन जरूरी है, ताकि दोनों अपने धार्मिक कर्तव्यों को समझते हुए शांति से अलग हो सकें।

इस आयत से हमें यह सिखने को मिलता है कि तलाक में केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से भी निर्णय लेने की जरूरत होती है। पति और पत्नी दोनों के बीच सम्मान और समझ का होना इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार एक सच्चे और पवित्र तलाक का संकेत है।

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