कुरान - 2:26 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

26
۞إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَسۡتَحۡيِۦٓ أَن يَضۡرِبَ مَثَلٗا مَّا بَعُوضَةٗ فَمَا فَوۡقَهَاۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ فَيَعۡلَمُونَ أَنَّهُ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّهِمۡۖ وَأَمَّا ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ فَيَقُولُونَ مَاذَآ أَرَادَ ٱللَّهُ بِهَٰذَا مَثَلٗاۘ يُضِلُّ بِهِۦ كَثِيرٗا وَيَهۡدِي بِهِۦ كَثِيرٗاۚ وَمَا يُضِلُّ بِهِۦٓ إِلَّا ٱلۡفَٰسِقِينَ

Transliteration: (Innal laaha laa yastahyeee ai yadriba masalam maa ba'oodatan famaa fawqahaa; faammal lazeena aamanoo faya'lamoona annahul haqqu mir rabbihim wa ammal lazeena kafaroo fayaqooloona maazaaa araadal laahu bihaazaa masalaa; yudillu bihee kaseeranw wa yahdee bihee kaseeraa; wa maa yudillu biheee illal faasiqeen)

26. अल्लाह इस बात से नहीं शर्माता कि वह कोई मिसाल दे —
चाहे वह मक्खी हो या उस से भी छोटी चीज़ [50]।
जो लोग ईमान रखते हैं, वो जानते हैं कि यह उनके रब की तरफ़ से हक़ है।
लेकिन जो लोग इनकार करते हैं, वो कहते हैं,
"अल्लाह ने ऐसी मिसाल देकर क्या मुराद ली?"
अल्लाह इससे बहुतों को गुमराह करता है,
और बहुतों को हिदायत देता है।
मगर वह गुमराही सिर्फ फासिकों को देता है। [51] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 26 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[50] छोटी से छोटी मिसाल में भी इलाही हिकमत

👉 मक्का के काफ़िरों ने कुरआन में दी गई छोटी मिसालों का मज़ाक उड़ाया —
जैसे मक्खी, मच्छर, मधुमक्खी वग़ैरह।
वे कहते थे: “क्या अल्लाह को सिर्फ यही उदाहरण देने को मिला?”

👉 इस आयत में अल्लाह ने जवाब दिया कि:
छोटी चीज़ भी अगर हक़ को ज़ाहिर करे, तो वह भी हिकमत से भरी होती है।

  • अल्लाह की नज़र में कोई मिसाल छोटी या बड़ी नहीं।
  • जो हक़ को बयान करती है, वह क़ीमती और मुफ़ीद है।

👉 इसी तरह,

  • जो लोग यह कहते हैं कि रसूल ﷺ की शान में काव्य या मिसालें ना दी जाएँ,
    उन्हें समझना चाहिए कि अगर मिसाल देना अल्लाह की شان में कमी नहीं करता,
    तो रसूल ﷺ की शान में तो और भी बढ़ोतरी करता है।

[51] कुरआन: राह भी, और इम्तिहान भी

👉 इस आयत से ये साबित होता है कि:

  • कुरआन हर किसी को अपने आप हिदायत नहीं देता।
  • हिदायत उन्हीं को मिलती है जिनके दिल सच्चे और नबी ﷺ से जुड़े हुए हों।

👉 इसका मिसाल यूँ समझिए:

  • कुरआन बारिश की तरह है।
    • अच्छी ज़मीन पर पड़े तो फसल उगती है।
    • बंजर ज़मीन पर गिरे तो कुछ नहीं उगता।

👉 इसलिए,

  • ईमान लाने से पहले इंसान कलीमा पढ़ता है, ना कि सीधा कुरआन।
  • क्योंकि सबसे पहले अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की पहचान ज़रूरी है।

👉 जो लोग फ़ासिक (सीमालंघन करने वाले) हैं,
यानी दिल से हठधर्मी, अहंकारी और नाफरमान हैं,
उन्हीं को कुरआन से गुमराही मिलती है।

नतीजा:
इस आयत में अल्लाह की हिकमत, मिसालों की अहमियत,
और कुरआन की हिदायत या गुमराही बनने की सच्चाई को बयान किया गया है —
और साथ ही ये साफ़ किया गया कि हिदायत पाने के लिए दिल की सच्चाई और रसूल ﷺ से मुहब्बत ज़रूरी है।

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