Transliteration: (Allazeena yanqudoona 'ahdal laahi mim ba'di meesaaqihee wa yaqta'oona maaa amaral laahu biheee ai yoosala wa yufsidoona fil ard; ulaaa'ika humul khaasiroon)
👉 इस आयत में "अल्लाह का अहद" उस आज़ली वादा की तरफ़ इशारा है,
जो अल्लाह ने तमाम इंसानी रुहों से लिया था —
कि वे अल्लाह को अपना रब मानें और उसके रसूलों पर ईमान लाएं,
ख़ास तौर पर आख़िरी रसूल मुहम्मद ﷺ पर।
👉 जो लोग बाद में नबी ﷺ को नहीं मानते,
वो दरअसल उस पहले किए गए अहद को तोड़ते हैं।
👉 यही वजह है कि ऐसे लोगों को कुरआन से हिदायत नहीं मिलती,
क्योंकि उन्होंने अपनी फितरत का वादा तोड़ दिया।
👉 "जिन्हें अल्लाह ने जोड़ने का हुक्म दिया" —
इससे मुराद है:
👉 जो लोग इन से रूहानी नाता तोड़ लेते हैं,
वो कुरआन से गुमराह हो जाते हैं,
भले ही वह कुरआन को पढ़ें या सुनें।
👉 इसके बरअक्स, जो लोग नबी ﷺ और औलिया से मुहब्बत रखते हैं,
वो कुरआन से पूरी हिदायत पाते हैं।
👉 इस आयत में तीन कामों को ग़ैर-मुस्लिमों की पहचान बताया गया है:
👉 ऐसे लोग इस दुनिया में भी और आख़िरत में भी घाटे में रहते हैं।
नतीजा:
ईमान का सही रास्ता वही है जो रसूल ﷺ और उनके वफ़ादारों से जुड़ कर चला जाए।
जो लोग इनसे कट जाते हैं, और हक़ से मुँह मोड़ते हैं —
वो ही असली घाटा उठाने वाले हैं।
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