कुरान - 2:27 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

27
ٱلَّذِينَ يَنقُضُونَ عَهۡدَ ٱللَّهِ مِنۢ بَعۡدِ مِيثَٰقِهِۦ وَيَقۡطَعُونَ مَآ أَمَرَ ٱللَّهُ بِهِۦٓ أَن يُوصَلَ وَيُفۡسِدُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِۚ أُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ

Transliteration: (Allazeena yanqudoona 'ahdal laahi mim ba'di meesaaqihee wa yaqta'oona maaa amaral laahu biheee ai yoosala wa yufsidoona fil ard; ulaaa'ika humul khaasiroon)

27. जो लोग अल्लाह के अहद (वचन) को तोड़ देते हैं,
उसके पक्के वादे को मान लेने के बाद [52],
और उन रिश्तों को काट देते हैं,
जिन्हें अल्लाह ने जोड़ने का हुक्म दिया है [53],
और ज़मीन में फसाद फैलाते हैं —
वही लोग असली घाटे में रहने वाले हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 27 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[52] अहद तोड़ने का मतलब: ईमान से मुकर जाना

👉 इस आयत में "अल्लाह का अहद" उस आज़ली वादा की तरफ़ इशारा है,
जो अल्लाह ने तमाम इंसानी रुहों से लिया था —
कि वे अल्लाह को अपना रब मानें और उसके रसूलों पर ईमान लाएं,
ख़ास तौर पर आख़िरी रसूल मुहम्मद ﷺ पर।

👉 जो लोग बाद में नबी ﷺ को नहीं मानते,
वो दरअसल उस पहले किए गए अहद को तोड़ते हैं।

👉 यही वजह है कि ऐसे लोगों को कुरआन से हिदायत नहीं मिलती,
क्योंकि उन्होंने अपनी फितरत का वादा तोड़ दिया।

[53] किन रिश्तों को जोड़ना और किन को काटना है

👉 "जिन्हें अल्लाह ने जोड़ने का हुक्म दिया" —
इससे मुराद है:

  • रूहानी और इमानी रिश्ते —
    यानी रसूल ﷺ, उनके सहाबा, और अल्लाह के नेक बन्दों से जुड़े रहना।
  • ऐसे लोग हिदायत का ज़रिया हैं, उनसे रूहानी ताल्लुक रखना फर्ज़ है।

👉 जो लोग इन से रूहानी नाता तोड़ लेते हैं,
वो कुरआन से गुमराह हो जाते हैं,
भले ही वह कुरआन को पढ़ें या सुनें।

👉 इसके बरअक्स, जो लोग नबी ﷺ और औलिया से मुहब्बत रखते हैं,
वो कुरआन से पूरी हिदायत पाते हैं।

[54] असल घाटा: हक़ से दूरी

👉 इस आयत में तीन कामों को ग़ैर-मुस्लिमों की पहचान बताया गया है:

  1. अल्लाह का वादा तोड़ना (ईमान से इंकार),
  2. जिनसे अल्लाह ने जोड़ने का हुक्म दिया उनसे नाता तोड़ना (रसूल, औलिया से दूरी),
  3. ज़मीन में फसाद मचाना (नफ़रत, गुमराही फैलाना)।

👉 ऐसे लोग इस दुनिया में भी और आख़िरत में भी घाटे में रहते हैं।

नतीजा:
ईमान का सही रास्ता वही है जो रसूल ﷺ और उनके वफ़ादारों से जुड़ कर चला जाए।
जो लोग इनसे कट जाते हैं, और हक़ से मुँह मोड़ते हैं —
वो ही असली घाटा उठाने वाले हैं।

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