कुरान - 2:28 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
كَيۡفَ تَكۡفُرُونَ بِٱللَّهِ وَكُنتُمۡ أَمۡوَٰتٗا فَأَحۡيَٰكُمۡۖ ثُمَّ يُمِيتُكُمۡ ثُمَّ يُحۡيِيكُمۡ ثُمَّ إِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ

Transliteration: (Kaifa takfuroona billaahi wa kuntum amwaatan fa ahyaakum summa yumeetukum summa yuhyeekum summaa ilaihi turja'oon.)

28. तुम अल्लाह का इंकार कैसे कर सकते हो,
जबकि तुम तो बेजान थे,
और उसने तुम्हें ज़िंदगी दी,
फिर वह तुम्हें मौत देगा,
फिर तुम्हें ज़िंदा करेगा,
और फिर उसी की तरफ लौटाए जाओगे। [55] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[55] ज़िंदगी का पूरा चक्र: चेतावनी और सबक

👉 “मरे हुए थे” का मतलब है — तुम्हारे पैदा होने से पहले तुम बेजान थे,
कोई शक्ल, कोई ज़िंदगी, कोई पहचान नहीं थी।

👉 फिर अल्लाह ने तुम्हें ज़िंदगी दी,
ताकि तुम इस दुनिया में इम्तिहान के लिए जियो।

👉 उसके बाद, मौत आएगी,
यानी एक बार फिर से बेजान बना दिया जाएगा।

👉 फिर क़ियामत के दिन दोबारा ज़िंदा किया जाएगा,
ताकि तुम्हारे अमल का हिसाब-किताब हो।

👉 और आख़िर में — तुम्हें अल्लाह के सामने पेश होना है,
जहां सवाल-जवाब और इंसाफ़ होगा।

क्या सबक है इस आयत में?

✅ तौहीद की दलील —
जब अल्लाह ही तुम्हारा खालिक़ (सिर्जनहार) है,
तो उसके इलावा किसी और को क्यों पूजते हो?

✅ ज़िंदगी एक इम्तिहान है —
यह दुनिया की ज़िंदगी सिर्फ़ एक अवधी है,
जिसमें अच्छे या बुरे अमल तय करते हैं कि
आख़िरत में इनाम मिलेगा या सज़ा।

✅ इंसान को घमंड नहीं करना चाहिए —
क्योंकि उसने अपनी ज़िंदगी खुद नहीं बनाई,
ना ही वह मौत या क़यामत को रोक सकता है।

✅ यह आयत याद दिलाती है कि एक दिन हर इंसान को
अपने रब के सामने हाज़िर होकर हिसाब देना है।
इसलिए अभी वक्त है सुधरने का और ईमान लाने का।

नतीजा:
अल्लाह ने इंसान को बेजान हालत से ज़िंदगी दी,
फिर मौत देगा, फिर ज़िंदा करेगा,
और अंत में अपने सामने पेश करेगा।
फिर भी अगर कोई इनकार करता है,
तो ये उसकी अकल और फितरत का घोर नुकसान है।

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