Transliteration: (Wa iz qaala rabbuka lil malaaa'ikati innee jaa'ilun fil ardi khaleefatan qaalooo ataj'alu feehaa mai yufsidu feehaa wa yasfikud dimaaa'a wa nahnu nusabbihu bihamdika wa nuqaddisu laka qaala inneee a'lamu maa laa ta'lamoon)
इस आयत से पता चलता है कि फ़रिश्तों को कुछ ग़ैब की बातें मालूम थीं, क्योंकि उन्होंने इंसानों के फ़साद और खून-खराबे की बात कही। ये अंदाज़ा उन्होंने शायद जिन्नात या पहले मख़लूक़ात को देखकर लगाया होगा। यह मुक़ालमा भी दिखाता है कि मशवरा देना अल्लाह की सुन्नत है — जहाँ राए ली जाती है। फ़रिश्ते एतराज़ नहीं कर रहे थे बल्कि अदब से अपना इल्म बयान कर रहे थे। इससे ये भी साबित होता है कि किसी के पीछे उसकी ग़ैर-हाज़िरी में बात करना जायज़ है अगर नियत सही हो और उसमें कोई बुराई ना हो।
जब फ़रिश्तों ने कहा: “हम आपकी तारीफ़ करते हैं और आपको पाक कहते हैं”, तो इसका मतलब था कि वे अपनी बंदगी और मक़ाम को बयान कर रहे थे। इससे साबित होता है कि अगर अदब से किया जाए तो अपने फ़ज़ीलत और किरदार का ज़िक्र करना जायज़ है। जैसे हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने मिस्र के बादशाह से कहा था: "मुझे ख़ज़ाने की निगरानी दो, बेशक मैं अमानतदार और इल्म वाला हूँ।” (सूरह यूसुफ़ 12:55)। इससे ये साबित होता है कि जब नियत खिदमत और ज़िम्मेदारी हो, तो अपनी सलाहियत का ज़िक्र घमंड नहीं बल्कि जायज़ दरख़्वास्त है।
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