Transliteration: (Huwal lazee khalaqa lakum maa fil ardi jamee'an summas tawaaa ilas samaaa'i fasaw waahunna sab'a samaa waat; wa Huwa bikulli shai'in Aleem)
👉 इस आयत से एक अहम उसूल मालूम होता है:
इस्लाम में हर चीज़ असल में हलाल है, जब तक कोई चीज़ कुरान या हदीस से हराम साबित न हो।
✅ यानी जो कुछ ज़मीन में है —
फ़व्वारे, फल, जानवर, पौधे, खनिज —
सब इंसान के फ़ायदे के लिए बनाए गए हैं।
✅ यहां तक कि कोई हराम चीज़ भी अगर इंसान अल्लाह की ख़ुशनूदी के लिए छोड़ दे,
तो उसे उससे भी सवाब मिलता है।
👉 यहां "फिर" का मतलब वक़्ती तर्तीब (chronological order) नहीं है,
बल्कि बयान की तर्तीब (narrative order) है।
✅ असल में पहले आसमान बनाए गए, जैसा कि सुरह अन-नाज़िआत (79:30) में भी है:
“फिर उसने ज़मीन को बिछाया।”
👉 लेकिन यहां ज़मीन को पहले क्यों ज़िक्र किया गया?
क्योंकि:
✅ इसलिए ज़मीन का ज़िक्र अहमियत और मक़सद के लिहाज़ से पहले किया गया,
ना कि तख़लीक़ (creation) के वक़्त के लिहाज़ से।
✅ ये जुमला बताता है कि अल्लाह की तख़लीक़ बे-मक़सद नहीं,
हर चीज़ उसके इल्म, हिकमत और मर्ज़ी से होती है।
नतीजा:
अल्लाह ने ज़मीन की हर चीज़ इंसान की सेवा के लिए बनाई।
फिर उसने आसमानों को सात दर्जों में मुकम्मल किया।
और वह हर शै से वाक़िफ़ है —
इसलिए हमें भी उसी के हुक्मों पर चलना चाहिए,
क्योंकि हम उसी की मख़लूक़ हैं।
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