कुरान - 2:31 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

31
وَعَلَّمَ ءَادَمَ ٱلۡأَسۡمَآءَ كُلَّهَا ثُمَّ عَرَضَهُمۡ عَلَى ٱلۡمَلَـٰٓئِكَةِ فَقَالَ أَنۢبِـُٔونِي بِأَسۡمَآءِ هَـٰٓؤُلَآءِ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ

Transliteration: (Wa 'allama Aadamal asmaaa'a kullahaa summa 'aradahum 'alal malaaa'ikati faqaala ambi'oonee bias maaa'i haaa'ulaaa'i in kuntum saadiqeen)

[31] और अल्लाह ने आदम को सभी चीज़ों के नाम सिखाए। फिर उन्हें फ़रिश्तों के सामने पेश किया और फ़रमाया, "अगर तुम सच्चे हो तो मुझे इन चीज़ों के नाम बताओ।" [60][61][62] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 31 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[60] आदम को अल्लाह की सीधी तालीम

इस आयत में “सिखाया” से मतलब ये है कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने उन नामों को समझकर सीखा। सिर्फ़ नाम बता देना और बात है, लेकिन सिखाना ये साबित करता है कि आदम अलैहिस्सलाम ने सही मायनों में इन चीज़ों का इल्म पाया। यह तालीम उन्हें बाकायदा समझाने और याद करवाने के साथ थी — जो नबियों की शान को दिखाती है, क्योंकि उन्हें असली इल्मी विर्सा अल्लाह से हासिल होता है।

[61] चीज़ों को पेश करने की हिकमत

“पेश किया” से मतलब ये है कि अल्लाह ने न सिर्फ़ नाम सिखाए बल्कि हर चीज़ को अलग-अलग पहचान के साथ फरिश्तों के सामने रखा। इससे दो बातें सामने आती हैं: हर चीज़ की अलग पहचान थी जो आदम अलैहिस्सलाम को मालूम थी; और यह कि नबियों को ग़ैब का इल्म अल्लाह की तरफ़ से दिया जाता है, क्योंकि वो चीज़ें ज़ाहिरी तौर पर मोजूद नहीं थीं, फिर भी आदम अलैहिस्सलाम उन्हें पहचानते थे — ये फ़रिश्तों के पास नहीं था।

[62] हकीकत का इम्तिहान, बोझ नहीं

जब अल्लाह ने फरिश्तों से कहा: “अगर तुम सच्चे हो तो इन नामों को बताओ,” तो इसका मक़सद उन्हें मुश्किल में डालना नहीं था, बल्कि ये दिखाना था कि इंसानी इल्म और नुबूवत की हक़ीक़त क्या होती है। ये ऐसे ही है जैसे काफिरों से कहा गया: “अगर तुम सच्चे हो तो इस जैसी एक सूरह ले आओ।” (सूरह बक़रह 2:23) — यानी दावा करना काफी नहीं होता, सबूत और हकीकत भी ज़रूरी है।

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