Transliteration: (Qaaloo subhaanaka laa 'ilma lanaaa illaa maa 'allamtanaaa innaka antal'aleemul hakeem)
इस आयत में फ़रिश्तों की विनम्रता और आजिज़ी झलकती है। वे खुले तौर पर मानते हैं कि उनका सारा ज्ञान सिर्फ़ अल्लाह की तालीम से है — उन्होंने खुद कोई दावा नहीं किया। लेकिन यहां इबलीस का नाम नहीं आता। उसकी ख़ामोशी इन्किसारी नहीं, बल्कि हसद और जहालत की निशानी थी। उसे नामों का ज्ञान नहीं था, और unlike फ़रिश्ते, उसमें इल्म भी नहीं था और न ही फ़रमाबरदारी। इसके बावजूद उसे भी आदम अलैहिस्सलाम को सजदा करने का हुक्म दिया गया था। इससे साबित होता है कि आदम अलैहिस्सलाम का इल्म इबलीस से बेहतर था। अगर कोई यह कहे कि इबलीस का इल्म रसूलुल्लाह ﷺ से ज़्यादा था, तो यह कुफ्र है, क्योंकि जो इबलीस से बेहतर है, वह नबी ﷺ से ऊपर नहीं हो सकता — और नबी ﷺ सारी मख़लूक़ात से अफ़ज़ल हैं।
फ़रिश्तों के अल्फ़ाज़ — “आप ही सब कुछ जानने वाले, हिकमत वाले हैं” — ये बताते हैं कि उनकी पहले की बात कोई एतराज़ या अल्लाह के हुक्म पर सवाल नहीं थी। बल्कि वो एक विनम्र और हिकमत समझने वाली दरख्वास्त थी। इससे ये भी सीख मिलती है कि अगर कोई सवाल इख़लास और अदब के साथ किया जाए, समझने की नियत से — न कि तकब्बुर या इंकार की नीयत से — तो वो जायज़ और क़ाबिल-ए-क़बूल होता है।
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