Transliteration: (Wa iz qulnaa lilmalaaa'i katis judoo liAadama fasajadooo illaaa Ibleesa abaa wastakbara wa kaana minal kaafireen)
फ़रिश्तों को दिया गया सज्दे का हुक्म शरीअत के सज्दे जैसा नहीं था, जैसा कि नमाज़ में किया जाता है। क्योंकि उस समय कोई शरीअत नाज़िल नहीं हुई थी, और शरीअत का हुक्म नबी के ज़रिए ही आता है। फ़रिश्तों पर वैसी शरीअत लागू नहीं होती जैसी इंसानों पर। यह सज्दा इज़्ज़त और एहतराम के तौर पर था, न कि इबादत के लिए। इस आयत से यह भी साबित होता है कि इल्म की फज़ीलत इबादत से ज़्यादा है — हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को जो फ़ज़ीलत मिली, वह उनके इल्म की वजह से थी, न कि सज्दे की वजह से।
इबलीस कभी बहुत बड़ा इबादतगुज़ार और इल्म वाला था, लेकिन उसने एक नबी के हुक्म के सामने सर झुकाने से इनकार कर दिया। उसका यह घमंड और इंकार ही उसे काफ़िर बना गया। यह एक बहुत बड़ा सबक है — कोई भी आलिम या इबादतगुज़ार अगर किसी नबी, ख़ासकर रसूलुल्लाह ﷺ की तौहीन करे या उनका इंकार करे, तो उसकी सारी इबादत और इल्म बेकार हो जाता है। नबियों का दर्जा बहुत ऊँचा है, और उनके सामने आज़माइश में सिर झुकाना ही असल बंदगी है।
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