कुरान - 2:34 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
وَإِذۡ قُلۡنَا لِلۡمَلَـٰٓئِكَةِ ٱسۡجُدُواْ لِأٓدَمَ فَسَجَدُوٓاْ إِلَّآ إِبۡلِيسَ أَبَىٰ وَٱسۡتَكۡبَرَ وَكَانَ مِنَ ٱلۡكَٰفِرِينَ

Transliteration: (Wa iz qulnaa lilmalaaa'i katis judoo liAadama fasajadooo illaaa Ibleesa abaa wastakbara wa kaana minal kaafireen)

[34] और (याद करो) जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सज्दा करो [66], तो उन्होंने सज्दा किया, मगर इबलीस ने इंकार किया और घमंड किया, और वह काफिरों में से हो गया [67]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[66] यह सज्दा शरीअत वाला सज्दा नहीं था

फ़रिश्तों को दिया गया सज्दे का हुक्म शरीअत के सज्दे जैसा नहीं था, जैसा कि नमाज़ में किया जाता है। क्योंकि उस समय कोई शरीअत नाज़िल नहीं हुई थी, और शरीअत का हुक्म नबी के ज़रिए ही आता है। फ़रिश्तों पर वैसी शरीअत लागू नहीं होती जैसी इंसानों पर। यह सज्दा इज़्ज़त और एहतराम के तौर पर था, न कि इबादत के लिए। इस आयत से यह भी साबित होता है कि इल्म की फज़ीलत इबादत से ज़्यादा है — हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को जो फ़ज़ीलत मिली, वह उनके इल्म की वजह से थी, न कि सज्दे की वजह से।

[67] इबलीस: इबादतगुज़ार से काफ़िर बना

इबलीस कभी बहुत बड़ा इबादतगुज़ार और इल्म वाला था, लेकिन उसने एक नबी के हुक्म के सामने सर झुकाने से इनकार कर दिया। उसका यह घमंड और इंकार ही उसे काफ़िर बना गया। यह एक बहुत बड़ा सबक है — कोई भी आलिम या इबादतगुज़ार अगर किसी नबी, ख़ासकर रसूलुल्लाह ﷺ की तौहीन करे या उनका इंकार करे, तो उसकी सारी इबादत और इल्म बेकार हो जाता है। नबियों का दर्जा बहुत ऊँचा है, और उनके सामने आज़माइश में सिर झुकाना ही असल बंदगी है।

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