कुरान - 2:270 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

270
وَمَآ أَنفَقۡتُم مِّن نَّفَقَةٍ أَوۡ نَذَرۡتُم مِّن نَّذۡرٖ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُهُۥۗ وَمَا لِلظَّـٰلِمِينَ مِنۡ أَنصَارٍ

Transliteration: (Wa maaa anfaqtum min nafaqatin aw nazartum min nazrin fa innal laaha ya'lamuh; wa maa lizzaalimeena min ansaar)

270. और जो कुछ भी तुम खर्च करते हो या कोई मन्नत (नज़र) मानते हो [711], तो बेशक अल्लाह उसे जानता है। और ज़ालिमों (अन्यायी लोगों) के लिए कोई मददगार नहीं है [712]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 270 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[711] मन्नत (नज़र) और खर्च — अल्लाह सब जानता है

इस आयत में दो बातें साफ़ कही गईं:

  1. जो भी तुम अल्लाह की राह में खर्च करते हो, चाहे वो:
    • दान (सदक़ा),
    • ज़कात,
    • या किसी नेक काम पर खर्च हो —
      अल्लाह उसे पूरी तरह जानता है।
  2. मन्नत (नज़र) मानना — यानी कोई इंसान यह कहे:

    "अगर मेरी ये दुआ क़बूल हो जाए तो मैं रोज़ा रखूँगा/गरीबों को खाना दूँगा।"

➡️ ऐसी मन्नतें इबादत से जुड़ी होनी चाहिए, और सिर्फ़ अल्लाह के नाम पर होनी चाहिए।
दूसरे दरगाहों या औलिया की मन्नतें अगर नेक मक़सद से हों, तो उनका इस्तेमाल दीन के काम में हो सकता है — लेकिन शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को भागीदार ठहराना) से बचना ज़रूरी है।

🔸 दो तरह की मन्नतें होती हैं:

  • दिनी मन्नत (Religious vow): जैसे रोज़ा रखना, नमाज़ पढ़ना — जो पूरी करनी वाजिब (ज़रूरी) है।
  • रस्मी या लफ़्ज़ी मन्नत (Cultural vow): जैसे कोई कहे "मैं ढोल बजाऊँगी अगर ये काम हो गया" — ये दीन का हिस्सा नहीं, बस एक रस्म है।

👉 असली मन्नत वो है जो अल्लाह से वादा हो, और उसे पूरा करना फ़र्ज़ है।

[712] ज़ालिमों के लिए कोई मददगार नहीं

इस आयत का दूसरा हिस्सा बहुत गहरी बात कहता है:

"ज़ालिमों के लिए कोई मददगार नहीं है।"

इसका मतलब:

  • जो लोग अल्लाह के हुक्मों के खिलाफ़ जाते हैं,
  • दीन का मज़ाक उड़ाते हैं,
  • या शिर्क, नाफ़रमानी और ज़ुल्म करते हैं —
    उन्हें क़यामत के दिन कोई नहीं बचा सकता।

🟤 नबी, औलिया, फ़रिश्ते — कोई भी अल्लाह के इजाज़त के बिना किसी की शफ़ाअत (सिफ़ारिश) नहीं कर सकता।

➡️ इसलिए, ज़ुल्म से बचो — चाहे वो दूसरों पर हो, या ख़ुद अपने नफ़्स पर।

सबक:
अल्लाह तुम्हारी हर मन्नत, हर खर्च, हर नीयत को जानता है — इसलिए उसे सिर्फ़ उसी के लिए करो।
और याद रखो — अगर इंसान ज़ुल्म की राह पर चला, तो कोई मददगार न होगा।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now