कुरान - 2:49 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

49
وَإِذۡ نَجَّيۡنَٰكُم مِّنۡ ءَالِ فِرۡعَوۡنَ يَسُومُونَكُمۡ سُوٓءَ ٱلۡعَذَابِ يُذَبِّحُونَ أَبۡنَآءَكُمۡ وَيَسۡتَحۡيُونَ نِسَآءَكُمۡۚ وَفِي ذَٰلِكُم بَلَآءٞ مِّن رَّبِّكُمۡ عَظِيمٞ

Transliteration: (Wa iz najjainaakum min Aali Fir'awna yasoomoonakum sooo'al azaabi yuzabbihoona abnaaa'akum wa yastahyoona nisaaa'akum; wa fee zaalikum balaaa'um mir Rabbikum 'azeem)

[49] और याद करो, जब हमने तुम्हें फिरऔन की क़ौम [92] से नजात दी, जो तुम पर सख़्त ज़ुल्म करते थे — तुम्हारे बेटों को क़त्ल कर देते थे और तुम्हारी औरतों को ज़िंदा रखते थे [93], और इसमें तुम्हारे रब की तरफ़ से बहुत बड़ी आज़माइश थी [94]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 49 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

🔹 [92] क़ौम से मुराद उसके मानने वाले

हालाँकि फिरऔन की अपनी औलाद नहीं थी, लेकिन क़ुरआन ने उसके मानने वालों और सिपाहियों को ही उसकी “क़ौम” कहा। इससे पता चलता है कि किसी क़ाइद के मानने वाले भी उसके घराने की तरह होते हैं, चाहे नसबी रिश्तेदार न भी हों।
इसी तरह, उम्मत-ए-मुहम्मद ﷺ को भी हुज़ूर ﷺ का रूहानी घराना कहा गया है — ईमान और मिशन की बुनियाद पर।

🔹 [93] फिरऔन का ख़्वाब और बच्चों का क़त्ल

एक मर्तबा फिरऔन ने ख़्वाब देखा कि यरूशलम से आग उठी जो उसके लोगों के घरों को जला रही है लेकिन बनी इस्राईल के घर महफ़ूज़ हैं।
उसके फालगीरों ने कहा कि बनी इस्राईल में एक बच्चा पैदा होगा जो तेरी सल्तनत को ख़त्म कर देगा।
फिरऔन ने हुक्म दे दिया कि बनी इस्राईल के सारे नवजात लड़कों को क़त्ल कर दिया जाए और लड़कियों को ग़ुलामी के लिए ज़िंदा रखा जाए।
क़रीब 70,000 बच्चे क़त्ल हुए और 90,000 औरतों ने डर से अपने बच्चे गिरा दिए।
जब क़िब्ती लोगों ने देखा कि बनी इस्राईल की मर्दाना आबादी घट रही है तो उन्होंने मशविरा दिया कि क़त्ल को हर साल के बजाए हर दूसरे साल किया जाए।
हज़रत हारून عليه السلام उस साल पैदा हुए जब क़त्ल नहीं होता था, और हज़रत मूसा عليه السلام उस साल जब क़त्ल का हुक्म था — मगर अल्लाह ने उन्हें बचा लिया।

🔹 [94] आज़माइश या नेमत?

इस आयत में एक गहरी बात छुपी है: क्या फिरऔन का ज़ुल्म एक बदनसीबी थी या अल्लाह की तरफ़ से निजात एक नेमत?
हकीकत ये है कि दोनों ही इम्तिहान थे —
ज़ुल्म था सब्र और ईमान का इम्तिहान,
निजात थी शुक्र और इताअत (आज्ञा) का इम्तिहान।
हर हाल — मुश्किल हो या आसानी — मोमिन के लिए एक इम्तिहान है। और मोमिन का फ़र्ज़ है कि वह हर हाल में ईमान और हिकमत के साथ जवाब दे।

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