Transliteration: (Wa iz waa'adnaa Moosaaa arba'eena lailatan summattakhaztumul 'ijla mim ba'dihee wa antum zaalimoon)
यह आयत इस बात का पक्का सबूत है कि अल्लाह की नेमतें और क़ुर्ब हासिल करने के लिए चालीस दिन का एतिकाफ़, रोज़ा, और तन्हाई इबादत — यह तरीका पैग़म्बरों का रहा है।
हज़रत मूसा عليه السلام को तौरेत इसी चालीस रातों की मुलाक़ात के दौरान दी गई।
हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ भी वही की शुरुआत से पहले ग़ार-ए-हिरा में तन्हाई इबादत करते थे।
इस आयत से ये भी साबित होता है कि किसी भी शक्ल में बुत बनाना मना है — चाहे मिट्टी से, धातु से या तस्वीरों से हो।
बनी इस्राईल ने मूसा عليه السلام की ग़ैरहाज़िरी में सोने के बछड़े को पूजा का ज़रिया बना लिया था, और अल्लाह ने इसे ज़ुल्म यानी अत्याचार कहा।
इससे ये भी साबित होता है कि बुत परस्ती सबसे बड़ा गुनाह और ज़ुल्म है।
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