कुरान - 2:51 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

51
وَإِذۡ وَٰعَدۡنَا مُوسَىٰٓ أَرۡبَعِينَ لَيۡلَةٗ ثُمَّ ٱتَّخَذۡتُمُ ٱلۡعِجۡلَ مِنۢ بَعۡدِهِۦ وَأَنتُمۡ ظَٰلِمُونَ

Transliteration: (Wa iz waa'adnaa Moosaaa arba'eena lailatan summattakhaztumul 'ijla mim ba'dihee wa antum zaalimoon)

[51] और (याद करो) जब हमने मूसा से चालीस रातों [95] का वादा किया, फिर तुमने (उनकी ग़ैरमौजूदगी में) बछड़े को (माबूद बना कर) अपना लिया, और तुम ज़ालिम थे [96]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 51 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

🔹 [95] चालीस दिन का सबूत

यह आयत इस बात का पक्का सबूत है कि अल्लाह की नेमतें और क़ुर्ब हासिल करने के लिए चालीस दिन का एतिकाफ़, रोज़ा, और तन्हाई इबादत — यह तरीका पैग़म्बरों का रहा है।
हज़रत मूसा عليه السلام को तौरेत इसी चालीस रातों की मुलाक़ात के दौरान दी गई।
हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ भी वही की शुरुआत से पहले ग़ार-ए-हिरा में तन्हाई इबादत करते थे।

🔹 [96] बुत परस्ती की मनाही

इस आयत से ये भी साबित होता है कि किसी भी शक्ल में बुत बनाना मना है — चाहे मिट्टी से, धातु से या तस्वीरों से हो।
बनी इस्राईल ने मूसा عليه السلام की ग़ैरहाज़िरी में सोने के बछड़े को पूजा का ज़रिया बना लिया था, और अल्लाह ने इसे ज़ुल्म यानी अत्याचार कहा।
इससे ये भी साबित होता है कि बुत परस्ती सबसे बड़ा गुनाह और ज़ुल्म है।

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