कुरान - 2:83 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

83
وَإِذۡ أَخَذۡنَا مِيثَٰقَ بَنِيٓ إِسۡرَـٰٓءِيلَ لَا تَعۡبُدُونَ إِلَّا ٱللَّهَ وَبِٱلۡوَٰلِدَيۡنِ إِحۡسَانٗا وَذِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡيَتَٰمَىٰ وَٱلۡمَسَٰكِينِ وَقُولُواْ لِلنَّاسِ حُسۡنٗا وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ ثُمَّ تَوَلَّيۡتُمۡ إِلَّا قَلِيلٗا مِّنكُمۡ وَأَنتُم مُّعۡرِضُونَ

Transliteration: (Wa iz akhaznaa meesaaqa Baneee Israaa'eela laa ta'budoona illal laaha wa bil waalidaini ihsaananw wa zil qurbaa walyataamaa walmasaakeeni wa qooloo linnaasi husnanw wa aqeemus salaata wa aatuzZakaata summa tawallaitum illaa qaleelam minkum wa antum mu'ridoon)

[83] और (याद करो) जब हमने बनी इस्राईल से वचन लिया: कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करना, और माँ-बाप के साथ भलाई करना, और रिश्तेदारों, यतीमों, और मोहताजों के साथ भी, और लोगों से अच्छी बात कहना, और नमाज़ क़ायम करना और ज़कात देना। फिर तुममें से कुछ को छोड़कर बाक़ी लोग मुँह मोड़ बैठे। और तुम तो हो ही मुँह मोड़ने वाले। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 83 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[149]

पूरे समर्पण का वचन:
यह वचन या तो तौरात के ज़रिए लिया गया, या उस समय जब अल्लाह ने तमाम आत्माओं से अपनी इबादत का वादा लिया। खास तौर से बनी इस्राईल से लिया गया कि वे केवल अल्लाह की इबादत करें और उसकी आज्ञा का पालन करें।

[150]

माँ-बाप के साथ भलाई:
उनकी सेवा, सम्मान और इच्छाओं की पूर्ति जीवन में जरूरी है। नफ़्ल इबादत भी अगर उनकी सेवा में रुक जाए तो बेहतर है, लेकिन फर्ज़ और वाजिब इबादत छोड़ना नहीं चाहिए। उनकी मौत के बाद भी उनके हक़ अदा करने के कई तरीके हैं: उनकी वसीयत को पूरा करना, उनकी तरफ से सदक़ा देना, और उनकी कब्र की ज़ियारत करना।

[151]

दया की प्राथमिकता:
सबसे पहले माँ-बाप, फिर रिश्तेदार, फिर यतीम, और फिर मोहताज—इस क्रम से मदद करना बताया गया है। यह बताता है कि खैरात और रहम-दिली में संतुलन और न्याय जरूरी है।

[152]

लोगों से अच्छे शब्दों में बात करना:
इसमें दावत देना, बुराई से रोकना और अच्छाई की ओर बुलाना शामिल है। तरीका इस्लामी और नरम लहज़े वाला होना चाहिए।

[153]

नमाज़ और ज़कात का पहले से हुक्म:
यह दिखाता है कि तौरात में भी नमाज़ और ज़कात फर्ज़ थे—हालांकि उनकी शक्ल अलग थी। वे दिन में दो बार नमाज़ पढ़ते और चौथाई माल ज़कात देते।

[154]

कुछ लोग डटे रहे:
ज्यादातर लोग मुंह मोड़ गए, लेकिन एक छोटा सा गिरोह अपने ईमान पर कायम रहा। यही लोग बाद में इस्लाम लाए और हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दुआ के जवाब में आए।

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