कुरान - 25:37 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
وَقَوۡمَ نُوحٖ لَّمَّا كَذَّبُواْ ٱلرُّسُلَ أَغۡرَقۡنَٰهُمۡ وَجَعَلۡنَٰهُمۡ لِلنَّاسِ ءَايَةٗۖ وَأَعۡتَدۡنَا لِلظَّـٰلِمِينَ عَذَابًا أَلِيمٗا

Transliteration: (Wa qawma Noohin lammaa kazzabur Rusula aghraqnaahum wa ja'alnaahum linnaasi Aayatanw wa a'tadnaa lizzaalimeena 'azaaban aleemaa)

और नूह की क़ौम को भी, जब उन्होंने रसूलों को झुठलाया [68], तो हमने उन्हें ग़र्क़ कर दिया और हमने उन्हें तमाम इंसानों के लिए एक इब्रतनाक निशानी बना दिया [69]; और हमने ज़ालिमों के लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है [70]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 37

"और नूह की क़ौम ने जब रसूलों को झुठलाया [68], तो हमने ग़र्क़ कर दिया और लोगों के लिए निशानी बना दिया [69]; और ज़ालिमों के लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है [70]।"

[68] एक रसूल का इंकार तमाम रसूलों का इंकार है

क़ौम-ए-नूह ने अगरचे सिर्फ़ हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को झुठलाया था, लेकिन अल्लाह ने फ़रमाया कि 'उन्होंने रसूलों को झुठलाया'—क्योंकि तमाम अंबिया का दीन एक ही था। किसी एक नबी का इंकार करना दरअस्ल तमाम अंबिया-ए-किराम का इंकार करना है।

[69] तूफ़ान-ए-नूह में ग़र्क़ होना और इब्रत का सबक़

हज़रत नूह की क़ौम साढ़े नौ सौ साल की तब्लीग़ के बावजूद जब ईमान न लाई, तो अल्लाह ने आसमान और ज़मीन से पानी का तूफ़ान भेजकर पूरी काफ़िर क़ौम को ग़र्क़ कर दिया और आने वाली नस्लों के लिए इब्रत की अज़ीम निशानी बना दिया।

[70] ज़ालिमों के लिए दायमी अज़ाब

दुनिया में ग़र्क़ होने के बाद अब आख़िरत में भी उन सरकशों के लिए जहन्नम की भड़कती हुई आग का दर्दनाक अज़ाब तैयार है।

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