कुरान - 25:77 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

77
قُلۡ مَا يَعۡبَؤُاْ بِكُمۡ رَبِّي لَوۡلَا دُعَآؤُكُمۡۖ فَقَدۡ كَذَّبۡتُمۡ فَسَوۡفَ يَكُونُ لِزَامَۢا

Transliteration: (Qul maa ya'ba'u bikum Rabbee law laa du'aaa'ukum faqad kazzabtum fasawfa yakoonu lizaamaa (section 6))

आप कह दीजिए, 'अगर तुम्हारी इबादत न हो तो मेरा रब तुम्हारी कोई परवाह नहीं करता [133-134]! बेशक तुमने तो झुठला दिया [135], चुनांचे अब लाज़िम हो जाने वाला अज़ाब तुम्हें आ पकड़ेगा [136]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 77 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 77

"आप कह दीजिए, 'अगर तुम्हारी दुआ व इबादत न हो तो मेरा रब तुम्हारी परवाह नहीं करता [133-134]! बेशक तुमने झुठलाया [135], पस अब लाज़िम अज़ाब पकड़ेगा [136]!'"

[133-134] बन्दगी और दुआ ही इंसान की क़द्र-ओ-क़ीमत का मियाद

सूरह अल-फ़ुरक़ान के इख़्तिताम पर हुज़ूर ﷺ को हुक्म हुआ कि लोगों से फ़रमा दें: अल्लाह तआला तुम्हारी ज़ात या तुम्हारे वुजूद का मोहताज नहीं है। अल्लाह के नज़दीक तुम्हारी इज़्ज़त और क़द्र सिर्फ़ इस वजह से है कि तुम उसकी इबादत करो, उसके आगे दुआ मांगो और उसके सामने गिड़गिड़ाओ। अगर तुम्हारे अंदर ईमान और बन्दगी नहीं, तो ख़ुदा के दरबार में तुम्हारी कोई वक़अत या हैसियत नहीं।

[135] हक़ और रसूल की तकज़ीब

काफ़िरों ने इस अज़ीम नेमत की नाक़द्री की और रसूलुल्लाह ﷺ और क़ुरआन-ए-पाक को झुठला कर अपने आप को अल्लाह की रहमत से महरूम कर लिया।

[136] 'अज़ाब-ए-लिज़ाम' यानी जंग-ए-बद्र और दोज़ख़ की पकड़

'लिज़ामा' उस अज़ाब को कहते हैं जो इंसान से चिमट जाए और कभी पीछा न छोड़े। दुनिया में यह अज़ाब जंग-ए-बद्र के दिन आया जहाँ कुरैश के सत्तर बड़े-बड़े सरदार मारे गए और ज़िल्लत की मौत मरे, और आख़िरत में जहन्नम की कभी न ख़त्म होने वाली आग उनका मुक़द्दर है।

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