Transliteration: (Qul maa ya'ba'u bikum Rabbee law laa du'aaa'ukum faqad kazzabtum fasawfa yakoonu lizaamaa (section 6))
"आप कह दीजिए, 'अगर तुम्हारी दुआ व इबादत न हो तो मेरा रब तुम्हारी परवाह नहीं करता [133-134]! बेशक तुमने झुठलाया [135], पस अब लाज़िम अज़ाब पकड़ेगा [136]!'"
सूरह अल-फ़ुरक़ान के इख़्तिताम पर हुज़ूर ﷺ को हुक्म हुआ कि लोगों से फ़रमा दें: अल्लाह तआला तुम्हारी ज़ात या तुम्हारे वुजूद का मोहताज नहीं है। अल्लाह के नज़दीक तुम्हारी इज़्ज़त और क़द्र सिर्फ़ इस वजह से है कि तुम उसकी इबादत करो, उसके आगे दुआ मांगो और उसके सामने गिड़गिड़ाओ। अगर तुम्हारे अंदर ईमान और बन्दगी नहीं, तो ख़ुदा के दरबार में तुम्हारी कोई वक़अत या हैसियत नहीं।
काफ़िरों ने इस अज़ीम नेमत की नाक़द्री की और रसूलुल्लाह ﷺ और क़ुरआन-ए-पाक को झुठला कर अपने आप को अल्लाह की रहमत से महरूम कर लिया।
'लिज़ामा' उस अज़ाब को कहते हैं जो इंसान से चिमट जाए और कभी पीछा न छोड़े। दुनिया में यह अज़ाब जंग-ए-बद्र के दिन आया जहाँ कुरैश के सत्तर बड़े-बड़े सरदार मारे गए और ज़िल्लत की मौत मरे, और आख़िरत में जहन्नम की कभी न ख़त्म होने वाली आग उनका मुक़द्दर है।
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