Transliteration: (Tabaarakal lazee nazzalal Furqaana 'alaa 'abdihee li yakoona lil'aalameena nazeera)
"बहुत ही बा-बरकत है [1] वह ज़ात जिसने अपने (ख़ास) बंदे पर फ़ुरक़ान नाज़िल फ़रमाया [2] ताकि वे तमाम जहान वालों के लिए डराने वाले बनें [3]!"
'तबारक' का मफ़हूम यह है कि अल्लाह तआला की ज़ात व सिफ़ात हर ऐब व नुक़्स से पाक, इंतिहाई बुलन्द और उसकी रहमत व बरकत हमेशा-हमेशा रहने वाली और बेइंतिहा वसीअ है। यह लफ़्ज़ अल्लाह की शान-ए-किबरियाई और फ़ज़्ल की कसरत को बयान करता है।
यहाँ 'अब्द' (बंदे) से मुराद हुज़ूर ख़ातमुन-नबिय्यीन सय्यिदुना मुहम्मद रसूलुल्लाह ﷺ हैं। अल्लाह तआला ने अपने हबीब को 'अब्द' फ़रमाकर यह वाज़ेह कर दिया कि ख़ुदा की बारगाह में सच्ची अज़मत और सबसे बुलन्द मर्तबा कामिल बन्दगी (उबूदियत) में है। और 'फ़ुरक़ान' क़ुरआन-ए-पाक का नाम है जो हक़ और बातिल, हिदायत और गुमराही के दरमियान फ़र्क़ करने वाली किताब है।
'नज़ीर लिल्-आलमीन' से साबित हुआ कि हुज़ूर अक़दस ﷺ सिर्फ़ अरब या किसी ख़ास ज़माने के लिए नहीं, बल्कि क़ियामत तक आने वाले तमाम इंसानों, जिन्नों और तमाम आलमीन के लिए नबी व रसूल और अज़ाब-ए-इलाही से डराने और आगाह करने वाले बनाकर भेजे गए हैं। आपकी रिसालत कायनातगीर और हमगीर है।
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