कुरान - 25:7 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

7
وَقَالُواْ مَالِ هَٰذَا ٱلرَّسُولِ يَأۡكُلُ ٱلطَّعَامَ وَيَمۡشِي فِي ٱلۡأَسۡوَاقِ لَوۡلَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مَلَكٞ فَيَكُونَ مَعَهُۥ نَذِيرًا

Transliteration: (Wa qaaloo maa li haazar Rasooli ya'kulut ta'aama wa yamshee fil aswaaq; law laaa unzila ilaihi malakun fa yakoona ma'ahoo nazeeraa)

और उन्होंने कहा, 'इस रसूल को क्या हुआ है कि यह खाना खाता है [15] और बाज़ारों में चलता-फिरता है [16]? इसके पास कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं उतारा गया जो इसके साथ डराने वाला (मददगार) बनकर रहता [17]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 7 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 7

"और उन्होंने कहा, 'इस रसूल को क्या हुआ कि खाना खाता है [15] और बाज़ारों में चलता-फिरता है [16]? इसके पास कोई फ़रिश्ता क्यों न उतारा गया जो साथ डराने वाला रहता [17]?'"

[15] रसूल के खाना खाने पर एतराज़

मुशरिकीन की जहालत थी कि वे नबी के लिए यह शर्त लगाते थे कि वह इंसान न हो, खाना न खाए और आम इंसानी हाजातों से जुदा हो। वे यह न समझ सके कि इंसानों की हिदायत और अमली नमूने के लिए रसूल का इंसानी जिन्स से होना ही रहमत और हिकमत है।

[16] बाज़ारों में तशरीफ़ ले जाने पर तअज्जुब

कुफ़्फ़ार कहते थे कि यह रसूल आम लोगों की तरह बाज़ार में क्यों जाता है। हुज़ूर ﷺ का बाज़ार तशरीफ़ ले जाना तवाज़ो (आजिज़ी), सादगी और उम्मत को हलाल रोज़ी कमाने व मुआमलात सिखाने की अमली तालीम थी।

[17] फ़रिश्ते की माईयत का मुतालबा

काफ़िर मुतालबा करते थे कि अगर यह सच्चे रसूल हैं तो इनके साथ कोई ज़ाहिरी फ़रिश्ता क्यों नहीं आता जो इनके नबी होने की गवाही दे और लोगों को डराए। यह उनकी सरकशी और ईमान न लाने का महज़ एक बहाना था।

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