कुरान - 25:4 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

4
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ إِنۡ هَٰذَآ إِلَّآ إِفۡكٌ ٱفۡتَرَىٰهُ وَأَعَانَهُۥ عَلَيۡهِ قَوۡمٌ ءَاخَرُونَۖ فَقَدۡ جَآءُو ظُلۡمٗا وَزُورٗا

Transliteration: (Wa qaalal lazeena kafarooo in haazaaa illaaa ifkunif taraahu wa a'aanahoo 'alaihi qawmun aakharoona faqad jaaa'oo zulmanw wa zooraa)

और काफ़िरों ने कहा [10], 'यह (क़ुरआन) तो बस एक मनगढ़ंत झूठ है जिसे इन्होंने खुद घड़ लिया है और इस पर कुछ दूसरे लोगों ने इनकी मदद की है [11];' पस यक़ीनन वे बड़ा ज़ुल्म और सरासर झूठ लेकर आए हैं [12]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 4 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 4

"और काफ़िरों ने कहा [10], 'यह तो बस एक मनगढ़ंत झूठ है जिसे इन्होंने घड़ लिया और दूसरे लोगों ने मदद की [11];' पस यक़ीनन वे बड़ा ज़ुल्म और सरासर झूठ लेकर आए हैं [12]।"

[10] क़ुरआन-ए-करीम पर काफ़िरों का बोहतान

कुफ़्फ़ार-ए-मक्का ने जब क़ुरआन-ए-पाक की बेमिसाल फ़साहत व बलाग़त देखी और उसका मुक़ाबला करने से आजिज़ आ गए, तो अपनी ज़िद और हठधर्मी की बिना पर कहने लगे कि यह अल्लाह का कलाम नहीं बल्कि रसूलुल्लाह ﷺ का खुद तराशा हुआ झूठ है।

[11] अहले-किताब से मदद लेने का झूठा दावा

काफ़िरों ने यह बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाया कि मक्का में रहने वाले कुछ ग़ैर-अरब अहले-किताब (जैसे जब्र या यसारा) ने यह बातें हुज़ूर ﷺ को सिखाई हैं। हालाँकि जो खुद अरबी ज़बान नहीं जानते थे, वे भला ऐसा मुअजिज़ कलाम कैसे सिखा सकते थे जिसका जवाब पूरी अरब दुनिया न दे सकी?

[12] सरासर ज़ुल्म और कज़ब का मुर्तकिब होना

अल्लाह तआला ने उनके इस बोहतान का सख्त रद्द फ़रमाया कि यह काफ़िर हक को जानते हुए भी ज़ुल्म (नाइंसाफ़ी) और खुले झूठ पर अड़े हुए हैं।

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