Transliteration: (Wa qaalal lazeena kafarooo in haazaaa illaaa ifkunif taraahu wa a'aanahoo 'alaihi qawmun aakharoona faqad jaaa'oo zulmanw wa zooraa)
"और काफ़िरों ने कहा [10], 'यह तो बस एक मनगढ़ंत झूठ है जिसे इन्होंने घड़ लिया और दूसरे लोगों ने मदद की [11];' पस यक़ीनन वे बड़ा ज़ुल्म और सरासर झूठ लेकर आए हैं [12]।"
कुफ़्फ़ार-ए-मक्का ने जब क़ुरआन-ए-पाक की बेमिसाल फ़साहत व बलाग़त देखी और उसका मुक़ाबला करने से आजिज़ आ गए, तो अपनी ज़िद और हठधर्मी की बिना पर कहने लगे कि यह अल्लाह का कलाम नहीं बल्कि रसूलुल्लाह ﷺ का खुद तराशा हुआ झूठ है।
काफ़िरों ने यह बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाया कि मक्का में रहने वाले कुछ ग़ैर-अरब अहले-किताब (जैसे जब्र या यसारा) ने यह बातें हुज़ूर ﷺ को सिखाई हैं। हालाँकि जो खुद अरबी ज़बान नहीं जानते थे, वे भला ऐसा मुअजिज़ कलाम कैसे सिखा सकते थे जिसका जवाब पूरी अरब दुनिया न दे सकी?
अल्लाह तआला ने उनके इस बोहतान का सख्त रद्द फ़रमाया कि यह काफ़िर हक को जानते हुए भी ज़ुल्म (नाइंसाफ़ी) और खुले झूठ पर अड़े हुए हैं।
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