कुरान - 22:18 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

18
أَلَمۡ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يَسۡجُدُۤ لَهُۥۤ مَن فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَن فِي ٱلۡأَرۡضِ وَٱلشَّمۡسُ وَٱلۡقَمَرُ وَٱلنُّجُومُ وَٱلۡجِبَالُ وَٱلشَّجَرُ وَٱلدَّوَآبُّ وَكَثِيرٞ مِّنَ ٱلنَّاسِۖ وَكَثِيرٌ حَقَّ عَلَيۡهِ ٱلۡعَذَابُۗ وَمَن يُهِنِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن مُّكۡرِمٍۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَفۡعَلُ مَا يَشَآءُ۩

Transliteration: (Alam tara annal laaha yasjudu lahoo man fis samaawaati wa man fil ardi wash shamsu walqamaru wan nu joomu wal jibaalu wash shajaru wad dawaaabbu wa kaseerum minan naasi wa kaseerun haqqa 'alaihil 'azaab; wa mai yuhinil laahu famaa lahoo mim mukrim; innallaaha yaf'alu maa yashaaa (make sajda))

18. क्या आपने नहीं देखा [40] कि अल्लाह ही के हुज़ूर सजदा करते हैं वे सब जो आसमानों में हैं और जो ज़मीन में हैं, और सूरज और चाँद और सितारे और पहाड़ और दरख़्त और चौपाए (जानवर) और बहुत-से इंसान भी [41]? और बहुत-से ऐसे हैं जिन पर अज़ाब साबित हो चुका है [42]; और जिसे अल्लाह ज़लील कर दे, तो उसे कोई इज़्ज़त देने वाला नहीं [43]; बेशक अल्लाह जो चाहता है करता है। ۩ (सजदा) (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 18 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 18 की तफ़सीर

"क्या आपने नहीं देखा [40] कि अल्लाह ही के हुज़ूर सजदा करते हैं वे सब जो आसमानों में हैं और जो ज़मीन में हैं, और सूरज और चाँद और सितारे और पहाड़ और दरख़्त और चौपाए (जानवर) और बहुत-से इंसान भी [41]? और बहुत-से ऐसे हैं जिन पर अज़ाब साबित हो चुका है [42]; और जिसे अल्लाह ज़लील कर दे, तो उसे कोई इज़्ज़त देने वाला नहीं [43]; बेशक अल्लाह जो चाहता है करता है। ۩ (सजदा)"

[40] कायनात की हर चीज़ का सजदा

आसमान व ज़मीन की तमाम मख़लूक़ात — फ़रिश्ते, सूरज, चाँद, सितारे, पहाड़, दरख़्त और जानवर — सब अल्लाह के हुज़ूर अपनी-अपनी ज़बान और अंदाज़ में सजदारिज़ और तस्बीहख़्वां हैं। सूरज व चाँद का तुलूअ व ग़ुरूब होना और सायों का ढलना उनका सजदा है।

[41-42] इंसानों की दो क़िस्में: मोमिन और मुनकिर

बहुत से इंसान ख़ुशी से अल्लाह को सजदा करते हैं (अहले ईमान), जबकि बहुत से ऐसे सरकश हैं जिन्होंने सजदे से इनकार किया और उन पर कुफ़्र की वजह से अज़ाब साबित हो चुका है।

[43] इज़्ज़त व ज़िल्लत अल्लाह के हाथ में

जिसे अल्लाह ज़लील कर दे, उसे कायनात की कोई ताक़त इज़्ज़त नहीं दे सकती; और जिसे अल्लाह इज़्ज़त बख़्शे, उसे कोई रुस्वा नहीं कर सकता। (यह आयते सजदा है, इसकी तिलावत और सुनने पर सजदा-ए-तिलावत वाजिब है)।

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