कुरान - 22:40 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

40
ٱلَّذِينَ أُخۡرِجُواْ مِن دِيَٰرِهِم بِغَيۡرِ حَقٍّ إِلَّآ أَن يَقُولُواْ رَبُّنَا ٱللَّهُۗ وَلَوۡلَا دَفۡعُ ٱللَّهِ ٱلنَّاسَ بَعۡضَهُم بِبَعۡضٖ لَّهُدِّمَتۡ صَوَٰمِعُ وَبِيَعٞ وَصَلَوَٰتٞ وَمَسَٰجِدُ يُذۡكَرُ فِيهَا ٱسۡمُ ٱللَّهِ كَثِيرٗاۗ وَلَيَنصُرَنَّ ٱللَّهُ مَن يَنصُرُهُۥٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَقَوِيٌّ عَزِيزٌ

Transliteration: (Allazeena ukhrijoo min diyaarihim bighairi haqqin illaaa any yaqooloo rabbunallaah; wa law laa daf'ul laahin naasa ba'dahum biba'dil lahuddimat sawaami'u wa biya'unw wa salawaatunw wa masaajidu yuzkaru feehasmul laahi kaseeraa; wa layansurannal laahu mai yansuruh; innal laaha la qawiyyun 'Azeez)

40. वे लोग जिन्हें उनके घरों से नाहक़ निकाल दिया गया सिर्फ़ इस बात पर कि वे कहते थे कि 'हमारा रब अल्लाह है!' [90] और अगर अल्लाह इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के ज़रिये न हटाता रहता, तो खानक़ाहें, और गिरजे [91], और यहूदियों की इबादतगाहें, और मस्जिदें जिनमें अल्लाह का नाम कसरत से लिया जाता है [92] सब ढा दी जातीं; और अल्लाह ज़रूर उसकी मदद फ़रमाएगा जो उसके दीन की मदद करेगा; बेशक अल्लाह बड़ी ताक़त वाला, बड़ा ज़बरदस्त है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 40 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 40 की तफ़सीर

"वे लोग जिन्हें उनके घरों से नाहक़ निकाल दिया गया सिर्फ़ इस बात पर कि वे कहते थे कि 'हमारा रब अल्लाह है!' [90] और अगर अल्लाह इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के ज़रिये न हटाता रहता, तो खानक़ाहें, और गिरजे [91], और यहूदियों की इबादतगाहें, और मस्जिदें जिनमें अल्लाह का नाम कसरत से लिया जाता है [92] सब ढा दी जातीं; और अल्लाह ज़रूर उसकी मदद फ़रमाएगा जो उसके दीन की मदद करेगा; बेशक अल्लाह बड़ी ताक़त वाला, बड़ा ज़बरदस्त है।"

[90] मुहाजिरीन का बे-गुनाह इख़राज

मुहाजिरीने किराम को मक्के के मुशरिकीन ने अपने घरों और वतन से बे-वजह निकाल बाहर किया। उनका कोई जुर्म न था सिवाए इसके कि वे अल्लाह को अपना वाहिद रब मानते थे और शिर्क से बेज़ार थे।

[91] इबादतगाहों का तहफ़्फ़ुज़ और जिहाद की हिकमत

जिहाद का मक़सद फ़साद फैलाना नहीं बल्कि फ़साद को रोकना और अमन व इबादत की आज़ादी क़ायम करना है। अगर अल्लाह तआला अहले हक़ के ज़रिये ज़ालिमों का ज़ोर न तोड़ता, तो रूए ज़मीन पर इबादतगाहें वीरान हो जातीं—चाहे वे पुराने ज़माने की खानक़ाहें (सबअह), ईसाई गिरजे (बिअह), यहूदियों के मआबिद (सलवात) हों, या इस्लाम की मस्जिदें हों।

[92] दीन-ए-इलाही की नुसरत और ग़ैबी मदद

जो बंदा अल्लाह के दीन, उसके रसूल ﷺ और उसकी शरीअत की सरबुलन्दी के लिए कोशिश करता है, अल्लाह तआला ग़ैब से उसकी मदद फ़रमाता है। अल्लाह बड़ी क़ुव्वत और ग़लबे वाला है, उसकी मदद जिसे हासिल हो जाए उसे कोई शिकस्त नहीं दे सकता।

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