Transliteration: (Uzina lillazeena yuqaataloona bi annahum zulimoo; wa innal laaha 'alaa nasrihim la Qaderr)
"उन लोगों को (जिहाद की) इजाज़त दे दी गई जिनसे (काफ़िरों ने) जंग छेड़ी है, इस वजह से कि उन पर ज़ुल्म किया गया [89]; और बेशक अल्लाह उनकी मदद करने पर पूरी क़ुदरत रखता है।"
यह क़ुरआन मजीद की पहली आयत है जिसमें मुसलमानों को काफ़िरों के मुक़ाबले में हथियार उठाने और जंग करने की इजाज़त दी गई। मक्का मुअज़्ज़मा में मुशरिकीन सहाबा-ए-किराम पर बे-इन्तहा ज़ुल्म ढाहते थे। सहाबा-ए-किराम ज़ख़्मी हालत में हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर होकर मुक़ाबले की इजाज़त मांगते थे, मगर हुज़ूर ﷺ फ़रमाते: "सब्र करो, मुझे अभी जंग का हुक्म नहीं हुआ।"
हिजरत के बाद जब मदीना मुनव्वरा में इस्लामी रियासत क़ायम हुई, तो यह आयत नाज़िल हुई और मज़लूम मोमिनीन को अपने दिफ़ाअ में लड़ने की इजाज़त मरहमत हुई। इससे साबित हुआ कि जिहाद और जंग का हुक्म अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के हुक्म और इज़्न के तहत ही मशरूअ है।
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